काफळ पाको!

जॉली ग्रांट / देहरादून :

प्रेम बड़ाकोटी

विचित्र, कुतूहल !
मेरे आवास के ठीक ऊपर,
मुण्ढेर से सटे,
ऊंचे वृक्ष की शाख पर,
एक पक्षी रात्रि भर,
काफल पाका,काफल पाको रटता,
अविराम निरन्तर,
बचपन की ग्रामीण यादों में बसी,
रात्रि की निस्तब्धता मे सुनी यह धुन ।

मैं सोचता हूँ !
शिवालिक की इस तलहटी में,
काफळ कहाँ मिलते है?
कहाँ फलते हैं?
शायद ! शताब्दियों पूर्व,
घने जंगल,विस्तृत, हरित पर्वत श्रेणियाँ,
शीतल जलवायु प्रचुर रही होंगी,
तो निश्चित, इस भूमि पर,
काफळ,बाँज,बुरांश,बेडू,हींसर,
की बहुतायत होगी।
इन घाटियों में निर्जनता तो थी, . किन्तु सम्पन्नता थी ।
प्राकृतिक सम्पदा का भण्डार अपार था,
पशुपक्षियों को समुचित आहार था ।
उर्वरा धरती,सघन वन,
सहज,सरल प्राकृतिक जीवन,
प्रकृति संरक्षित थी, सुरक्षित थी।

ऊँचाई पर उगने वाला ‘काफळ’,
जेठ, आषाढ़ की सौगात यह फल,
सन्देश वाहक यह पक्षी,
दूर घाटियों तक, स्वर गुजाता,
काफल पकने का संकेत देता ।
काफल पाको,’ नाम से परिचित,
सदियों से मुदित आह्लादित ।

मौलिक प्रश्न ?
कि,
प्रकृति बदली,भूआकृति बदली,
वृक्ष,खेत . वन, जंगल में अब,
कृत्रिमता उग आई
पर ! इस पक्षी ने, काफल पकने की सूचना,संकेत,रैबार,
यह नैसर्गिक सद्भाव नहीं बदला,
स्तुति,आभार !
प्रकृति बदली,पर्यावरण बदला,
पर तूने,
ग्राम्य -स्मृति को झंकृत करने का,
निज स्वभाव नहीं बदला !!