स्मरणाञ्जलि: उत्तराखण्ड में संघकार्य विस्तार-श्रृंखला के एक वाहक : स्व० धर्मवीर जी

-प्रेम बड़ाकोटी

देहरादून

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति का एक वैशिष्ट्य है,संघ की प्रचारक व्यवस्था । जिसमें दैनिक शाखा में सक्रिय,संस्कारित कार्यकर्ता अपने घर परिवार से निकल कर संघकार्य के लिये पूर्णकालिक बनकर समाज के बीच जाता है, उसे प्रचारक कहा जाता है। नये कार्यक्षेत्र से सर्वथा अपरिचित, प्रचारक नाम का यह युवा नया है, किन्तु शीघ्र ही क्षेत्र में यह एक परिवारजन की माँति समरस हो जाता है । स्वयंसेवक परिवारों में घर जैसा स्नेह व अपनापन तनमन से कार्य करने की प्रेरणा देते हैं। समाज के इस अपनेपन तथा संघकार्य का वैशिष्ट्य दोनो के सहअस्तित्व से सघकार्य के लिये समय देने वाले इस कार्यकर्ता को कभी भी अनुभव हो नहीं होता कि कब और कैसे घर से पृथक हुए एक बड़ा अन्तराल बीत गया । समाज जन इसे कार्य के प्रति निष्ठा और समर्पण की संज्ञा से सम्बोधित करते हैं और इसे सम्मान का स्थान देते हैं। प्रचारक या पूर्णकालिक कार्यकर्ता को कभी भी प्रशंसा या सम्मान की दरकार नहीं रहती, पर समाज का मनोभाव स्वभावतः आदर का होता है। एक और बात ! प्रचारक कार्यकर्ता के क्षेत्र से जाने के बाद कभी कभी इस बात की भी खोज होती है कि वे कहाँ जन्में थे ? उनका घर परिवार ? उनकी शिक्षा दीक्षा आदि, यह तो कभी पूछा ही नहीं । कारण, संघ में परिचिय कराते समय, नाम, संघ में प्रवेश की अवधि, सघ का प्रशिक्षण ? केवल इतना ही 3ल्लेख होता है। यही परम्परा संघ स्थापना के साँ वर्षों से निरन्तर है।

इस आलेख में पुरानी पीढ़ी के स्वयंसेवक, प्रचांरक स्व० श्री धर्मवीर जी की चर्चा, उनका पुण्यस्मरण यह मित्र धर्म का पालन है, यह सीमित लेख उसी कर्तव्य की पूर्ति है। भूमिका के रूप में संघ के उस सिस्टम की उपरोक्त चर्चा भी आवश्यक थी, जिसके वे प्रतिनिधि रहे । प्रचारक काल के साथी के नाते जितनी जानकारी मुझे होगी, उसकी ही संक्षिप्त चर्चा श्रद्धावनत मैं यहाँ करूँगा, जो उनके प्रति किञ्चित सुमनाञ्जलि हो होगी ।

श्री धर्मवीर जी से मेरा परिचय वर्ष १९७० से रहा,जब मैं मेरठ में कक्षा १० का विद्यार्थी था। वे मेरे मामा श्री गणेश घनशाला जी के सहपाठी थे और फिर कानपुर संघ शिक्षा वर्ग के सह शिक्षार्थी भी। अपने मिलनसार स्वभाव के अनुरूप मित्रवत् वे मेरठ आते रहे । कृषकाय, दुबली पतली काया, उनका सहज, सादगी भरा सरल स्वभाव, जिनसे मैं प्रारम्भ से ही अनुप्राणित हू, जीवन के अन्तिम समय तक ये सब गुण उनमे विद्यमान रहे । ग्रामीण क्षेत्र के सामान्य परिवार से निकला कार्यकर्ता जिसने पढ़ाई पूरी को हो,परिवार के लोगों की इच्छा रहती है कि बालक खेती,रोजगार करे, गृहस्थी करे, किन्तु माता पिता के इस आशय का सम्मान करते हुए भी संघ के सौ वर्षों के इतिहास में सहस्रों युवा मोह त्याग, संघकार्य के लिए निकले। पढ़ाई पूरी कर उन्हें सन्तोषजनक सरकारी नौकरी भी मिली, जो जीवन यापन के लिये पर्याप्त थी। किन्तु धर्मवीर जी १९७१ में नौकरी छोड़कर प्रचारक बन गये ।

वर्ष १९७४ में पढ़ाई पूरी कर मैं प्रचारक हीकर सहारनपुर गया । वे चमोली के जिला प्रचारक थे। सम्पूर्ण गढ़वाल क्षेत्र, बिजनौर तथा सहारनपुर जनपद को मिलाकर सहारनपुर विभाग कहा जाता था। मा० सूर्यकृष्ण जी इस विभाग के प्रचारक थे। सहारनपुर, विभाग का केन्द्र होने के कारण गढ़वाल भर के कार्यकर्ताओं का सहारनपुर आना जाना रहता था। इस निमित्त धर्मवीर जी से यदाकदा भेंट मुलाकात का यह सहज अवसर था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का पहला मुख्यालय राजामण्डी आगरा,पश्चात शंकर आश्रम मेरठ और फिर नया प्रदेश बनने पर देहरादून, साल भर में प्रचारक बैठक, संघ शिक्षा वर्ग तथा अन्य बैठकों के क्रम में अन्य कार्यकर्ताओं की भाँति उनसे निकटता से चर्चा का अवसर मिलता था। कार्य के वृत्त निर्वेदन सत्र में कार्यकर्ता के कार्य तथा कृतत्व का सही परिचय मिलता है, इन क्षणों में उनसे कुछ व्यवहारिक बातें, रीतिनीति भी सीखने को मिली । भारत के सीमान्त से आया एक साधारण सा कार्यकर्ता, उसे देखने, समझनें का कुतूहल तो रहता ही था ।

उल्लेखनीय है कि, वर्ष १९८०-८१ में देशभर में जिलाश: संघ का इतिहास लेखन की योजना बनी । मा० ओमप्रकाश जी पश्चिमी उ० प्र० के प्रान्त प्रचारक थे। इतिहास लेखन का यह कार्य कठिन था, क्योंकि संघ ने अपने संगठन जीवन का इतिहास कभी लिखा नहीं, चर्चानहा की । स्वयंसेवको ने अपने शौर्य व साहस से इतिहास रचा है, बनाया है, जो कि स्वयं में प्रेरक है, यशस्वी है। चमोली जिले के इतिहास में स्व० धर्मवीर जी का नामोल्लेख है। आपात्काल से पूर्व ७० के दशक में वे चमोली जनपद के प्रचारक थे,जिले के व प्रथम प्रचारक थे। उस समय के उनको टीम के, उनके द्वारा गढ़े गये अधिकाश कार्यकर्ता दिवंगत हो गये। जानकारी रहे, इसीलिये कुछ नामों का उल्लेख यहां करना योग्य रहेगा । बदरी केदार के प्रतापसिंह पुष्पवाण,गोपेश्वर के वरिष्ठ समाजसेवी पत्रकार श्री धनज्जय भट्ट, अनसुया प्रसाद भट्ट, पूरनसिंह विष्ट, अधिवक्ता श्री प्रेम्बल्लभ भट्ट, शैलेन्द्र भण्डारी, रुद्रप्रयाग के सुन्दरमणि भट्ट,कर्णप्रयाग के वाचस्पति डिमरी, सरदार सन्तसिंह, नारायणकोटी प्रकल्प भूमि के दानदाता श्री प्रेम बिश्नोई, आदि, अन्य भी । ये सभी कार्यकर्ता अपने अपने स्थानों पर कार्य के सूत्रधार रहे, समाज में प्रभावी रहे। जनपद में उस समय के पुराने कार्यकर्ताओं के मध्य उनके पुरुषार्थ की चर्चा होती थी। आज भी अगली पीढ़ी जिन्होंने अपने बालक नेत्रों से धर्मवीर जी को देखा था, उनके मन में आज भी पुरानी स्मृति ताजा है। पवित्र तीर्थ, बदरी केदार के इस क्षेत्र में संघशाखा को जिले के अधिकाँश स्थानों तक पहुंचाने की शुरुआतका उनके समय में हुई । साधनों के अभाव में मीलोमील पैदल चलकर परिश्रमपूर्वक संघ का विचार जनसामान्य तक पहुंचा । उस कालखण्ड में पहाड़ के सीमान्त पर दुर्गम स्थानों पर पहुँचना यह कितना दुष्कर था, मैदानी क्षेत्र से आया, यहाँ के भूगोल से अनजान कार्यकर्ता, विपरीत जलवायु, दुरूह पगडंडियां, सुदूर जोशीमठ,मन्दाकिनी,पिण्डर घाटियों का कठिन पहुँच मार्ग, किन्तु वे एक सफल प्रचारक कहलाये और पहाड़ के सरल, धर्मप्राण समाज ने धर्मवीर जी को परिवार के सदस्य की तरह अंगीकार किया।

१९७५ में आपात्काल के समय पूरे उत्तरावण्ड में सक्रिय कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार किया, जिनमे चमोली से सरस्वती शिशु मन्दिर योजना के श्री ज्ञानसिंह नेगी तथा श्री विद्यादत्त तिवारी के नाम प्रमुख हैं। धर्मवीर जी इमरजन्सी के अन्त तक पुलिस के हाथ नहीं आये । जबकि प्रचारक होने के कारण पुलिस के पहले निशाने पर वे ही थे। २१ महीने, आपातकाल के लम्बे अन्तराल तक वे वेश बदल कर साहस के साथ प्रवास करते रहे। इतना ही नही, साथ लगे पौड़ी से भी जब श्रीमोहनसिंह रावत’ गाँववासी, श्री गोपाल सिह रावत आदि वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की टीम जेल चली गई तो उन्होंने पौड़ी जनपद की भी चिन्ता की, दौरा किया। आपात्काल के उस भय के माहौल में, गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के परिवारों की कुशलक्षेम पूछना, संगठन के भूमिगत कार्य में सक्रियता, ऊपर से आई सूचना व योजना की जानकारी कार्यकर्ताओं तक पहुँचाना आदि। कल्पना करें यह काम उस समय कितना मुश्किल था जबकि संचार के साधन न के बराबर थे। वे एकाध बार हिम्मत कर, बन्दी कार्यकर्ताआं को मिलने लॉक अप तक भी गये । उनका पहाड़पर इतना सम्बन्ध सम्पर्क था कि संघ के विचारों विरोधी भीउनके हितचिन्तक थे । आपात्काल में भूमिगत रहते हुए ये सभीव्यक्ति व इनके परिवार उनके कार्य में सहयोगी बने। ये सभी प्रसंग प्रत्यक्षदर्शी स्वयंसेवकों के मुख से कहे तथा सुने गये है। उनके कार्यकाल की प्रथम टोली के किशोर विद्यार्थी, गोपेश्वर निवासी प्रो० राकेश भट्ट का कहना है कि, १९७३ में उनके आग्रह व प्रयास से हम तीन छात्र गोपेश्वर, चमोली से संघ शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षण के निमित्त गोला गोकर्णनाथ गये थे । प्रो ०भट्ट का बताते है कि आपात्काल में उनके भूमिगत क्रियाकलापों की सम्पूर्ण जानकारी भी विश्वासपात्र विद्यार्थी स्वयंसेवक के नाते हमें ही रहती थी। क्योंकि छात्र की स्वाभाविक सक्रियता पर पुलिस प्रशासन को सन्देह नहीं होता ।

१९९८ के चमोली भूकम्प के समय, केशवपुरम मनेरी में रह रहे,भागीरथी धाटी के राहत व पुनर्निर्माण में लगे डा0 नित्यानन्द जी ने इस विशेष परिस्थिति में धर्मवीर जी को याद किया । कारण कि, भूकम्प की त्रासदी से ध्वस्त चमोली के राहत के लिए बाहर समाज से राहत के लिये जो सामग्री आ रही थी उसे आवश्यकताजनित क्षेत्रों में पहुँचाना तथा राहत टीमों की योग्य व्यवस्था तथा मार्गदर्शन यह एक बड़ा योजकता तथा सेवा का काम था। आपदाकाल में पीड़ितों की समस्यायें धैर्यपूर्वक सुनना, आगन्तुकों को सटीक जानकारी देना यह एक बड़ा काम था । चमोली गढ़वाल के भूगोल से परिचित सेवाभावी श्री धर्मवीर जी ने चमोली में बने राहत शिविर मे रहकर स्थानीय कार्यकर्ताओं के सहयोग से इसे बखूबी निभाया, तन्मयता के साथ यहाँ रहे,जुटे ।

नियम पालक,कड़े अनुशासन के धनी श्री धर्मवीर जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तरावण्ड प्रान्त के कार्यालय प्रमुख भी रहे। कार्यालय का रखरखाव,व्यवस्थित हिसाब किताब, आवश्यक जानकारी नोट करना यह उनकी व्यवस्था का विशेष हिस्सा था। साथ ही डायरी लेखन, समाचारपत्रों से प्राप्त प्रेरक प्रसंगों को सुरक्षित रखना उनकी दिनचर्या में सम्मिलित था। उन्हें इस अवसया में भी सैकड़ों कार्यकर्ताओं के नाम याद थे और अधिकांश के टेलीफोन नम्बर भी। ठीक ठीक हिसाब के विषय पर उनकी कड़ाई उदाहरण योग्य है। कई बार व्यवस्था पक्ष पर किसी कार्यकर्ता की उदासीनता तथा उपेक्षा पर वे नाराज भी होते थे,फिर समझाते थे कि व्यवस्थित रहना स्वयंसेवक का पहला गुण है। लेखन कार्य,दैनिक अनुभव संकलन के रूप में उन्होंने जीवन के अन्तिम समय तक किया।

सेवाभावी स्वभाव के धनी धर्मवीर जी उत्तराखण्ड में प्रान्तीय सेवा प्रमुख के दायित्व पर भी रहे । पिछड़ी बस्ती जिसे सेवा बस्ती नाम दिया गया है, वहाँ चलने वाले सेवा केन्द्रों पर स्वयं जाकर केवल निरीक्षण ही नहीं बल्कि बालक, बालिकाओं, उनके अभिभावकों से प्रत्यक्ष बात करना, केन्द्र को चलाने वाले कार्यकर्ता की कठिनाई समझना, उसे दूर करने की कोशिश करना, यह उनमें था। सेवाकेन्द्र चलाना ही नहीं बल्कि सेवा अपनी आदत में चाहिये,यह भी उनका आग्रह था। वे प्रचारक थे, संघ का यह विचार कि, समाज में प्रत्येक परिवार अपना है, इस भाव के साथ अनेक सहयोगी कार्यकर्ताओं के परिवार में एक सदस्य की तरह उनका सम्पर्क, सम्बन्ध रहा। दूर रहकर भी सदस्यों का कुशलक्षेम पूछना,परिवार में कन्याओं के विवाह अवसर पर उपस्थित रहना,यह उनकी रुचि, स्वभाव था।

वर्ष १९ ७१ से २०२६ तक एक पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में निरन्तर ५ ५ वर्षों की उनकी सतत् साधना,जो समाज के लिये इस नाते प्रेरणादायी है कि संघ की पद्धति, परम्परा में समाज कार्य के लिये जीवन देने की परिपाटी है,जिसका संगठन में एक लम्बा इतिहास है। ७७ में आपात्काल हटने के बाद संघ की एक बैठक मे पधारे लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने परिचय के क्रम में कार्यकर्ताओं से पूछा था,- समाज कार्य में इतने लम्बे समय तक जीवन लगाने पर क्या कभी घर लौटने, परिवार बसाने की इच्छा नहीं होती ? इस प्रश्न का उत्तर क्या हो सकता है ? किन्तु यह सच है कि समर्पित कार्यकर्ताओं की जो श्रृंखला यहाँ खड़ी हुई, वह संघ संस्थापक डॉ० हेडगेवार के गूढ़ विचार मन्थन का निकष है, उन्होंने स्वयं के जीवन में इसे चरितार्थ किया था ।

२३ जून २०२६ को ७९ वर्ष की अवस्था में श्री धर्मवीर सिंह जी का शरीर शान्त हो गया । संघ की योजना से वे काफी समय से अपने पुराने क्षेत्र मेरठ में थे । उत्तराखण्ड की तरह मेरठ में भी उनका व्यापक परिचय रहा है। मेरठ और देहरादून दोनों स्थानों पर स्व० धर्मवीर जी की स्मृति में श्रद्धाञ्जलि कार्यक्रम हुए जिनमें संघ परिवार के स्वयंसेवका ने उनके जीवन प्रसंगों का वर्णन किया । अपने साधक जीवन में जिस कार्य के निमित्त वे आये थे, उसे पूरा कर, महागमन कर गये, यही प्रकृति का शाश्वत विधान है,जिसे भारी अन्तःकरण से स्वीकार करना ही होगा।