वैश्विक केंद्र बन चुका है लेखकगाँव

देहरादून

आशा कोठारी

Ramesh Pokhriyal Nishank की परिकल्पना से स्थापित लेखकगाँव आज केवल एक साहित्यिक परिसर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, साहित्य, कला, अध्यात्म और प्रकृति के समन्वय का एक वैश्विक केंद्र बन चुका है। हिमालय की शांत वादियों में विकसित यह अनूठा प्रकल्प अब देश-विदेश के साहित्यकारों, कलाकारों, चिंतकों, शिक्षाविदों और संस्कृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।
भारत के पूर्व राष्ट्रपति Ram Nath Kovind से लेकर मॉरीशस के पूर्व राष्ट्रपति Prithvirajsing Roopun तक अनेक अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विभूतियाँ लेखकगाँव की गरिमा को अनुभव कर चुकी हैं। देश के राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, न्यायपालिका के वरिष्ठ सदस्यों, साहित्यकारों, कलाकारों और आध्यात्मिक गुरुओं की सतत उपस्थिति ने लेखकगाँव को राष्ट्रीय विमर्श के एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में स्थापित किया है।
यहाँ साहित्य केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रकृति, लोकसंस्कृति, संगीत, नृत्य, अध्यात्म और भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ जीवंत संवाद करता है। यही कारण है कि लेखकगाँव में देशभर के कवि, लेखक, पत्रकार, रंगकर्मी और कलाकार अपनी सृजनात्मक ऊर्जा को नई दिशा देने के लिए पहुँच रहे हैं।
कला और संस्कृति के क्षेत्र में Sonal Mansingh, Kailash Kher, Kumar Vishwas, Leeladhar Jagudi और Mamta Kalia जैसी विभूतियों की सहभागिता ने लेखकगाँव को सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बनाया है। वहीं आध्यात्मिक क्षेत्र में Avdheshanand Giri और Chidanand Saraswati जैसे संतों का सान्निध्य इसे आध्यात्मिक चेतना से भी जोड़ता है।
आज विश्व के लगभग पैंसठ देशों से साहित्य और संस्कृति प्रेमी लेखकगाँव से जुड़ चुके हैं। हजारों विद्यार्थी शैक्षणिक भ्रमण के लिए, युवा रचनाकार सृजन के लिए और संस्कृतिकर्मी अपनी प्रस्तुतियों के लिए यहाँ पहुँच रहे हैं।
लेखकगाँव वास्तव में उस भारतीय सांस्कृतिक स्वप्न का साकार रूप बनता दिखाई देता है जहाँ साहित्य, प्रकृति, संस्कृति और मानवीय संवेदनाएँ एक साथ विकसित होती हैं। यही कारण है कि आज लेखकगाँव को विश्वस्तरीय सांस्कृतिक एवं साहित्यिक केंद्र के रूप में देखा जाने लगा है।