देहरादून:
आशा कोठारी

(9 फरवरी,जन्मदिन पर)
(श्री प्रेम बड़ाकोटी जी की कलम से)
“उत्तराखंड हिमालय, विषम धरातल का यह भूभाग, प्राकृतिक आपदाओं क्षेत्र है। सन् 1803 ई० में यहाँ एक भीषण भूकंप आया था। इससे अधिकांश भवन ध्वस्त हुए थे,पहाड़ में दरारें पड़ गई थीं, पुराने जलस्रोत सूख गए,नए निकल आए थे। वर्षभर भूकंप के झटके आते रहे। उस काल में भी यहाँ के जनमानस ने इस चुनौती का सामना किया । अपने भवन स्वयं बनाए तथा अस्त-व्यस्त जनजीवन को पुनः अपने पैरों पर खड़ा किया। तब किसने उनकी सहायता की थी? 1970 में ‘गोहना ताल’ टूटने से सम्पूर्ण अलकनन्दा घाटी का भारी विनाश हुआ। 1991 उत्तरकाशी 6.3 व 1999 चमोली 6.8 रिक्टर स्केल, ऐसे दो बड़े भूकंप गढ़वाल में आए। वर्ष 1998 में रुद्रप्रयाग की मद्महेश्वर घाटी का व्यापक भूस्खल से हुआ भारी विनाश तथा 2013 में केदारघाटी में अतिवृष्टि से बड़ी जनधन हानि हुई, बड़ी संख्या में तीर्थ यात्री कालकवलित हुए। आपदा के ऐसे अवसरों पर शासन तथा देशभर की सामाजिक संस्थाओं ने सहायता की। परन्तु केवल इस सहायता से ही सम्पूर्ण पुनर्निर्माण का कार्य संभव नहीं है।
हिमालय निरन्तर ही आपदाओं का क्षेत्र है, किन्तु इनसे घबराने की आवश्यकता नहीं है। सहयोग व स्वावलंबन में बड़ी शक्ति होती है।स्वयं खड़े होकर यहाँ के पुरुषार्थी समाज ने इन चुनौतियों का सामना किया और उदाहरण प्रस्तुत किया कि परस्पर सहयोग के बूते हम निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं।
-डॉ० नित्यानन्द
प्रख्यात भूगोलवेत्ता तथा समाजसेवी,डॉ० नित्यानन्द जी के नाम तथा उनके सामाजिक कार्यों से देशभर के अनेक सामाजिक कार्यकर्ता,शिक्षा क्षेत्र के अध्येता खूब परिचित हैं। भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में जिन भूगोलवेत्ताओं ने ख्याति पाई है,उनमें डॉ० नित्यानन्द जी का नाम बड़े आदर से लिया जाता है, उनके शैक्षणिक योगदान की भी चर्चा होती है।
9 फरवरी 1926 को आगरा,उ०प्र० में जन्मे डॉ०नित्यानन्द जी छोटी अवस्था में ही 1940 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आये । प्रथम सानिध्य पं० दीनदयाल उपाध्याय का मिला और मात्र 18 वर्ष की आयु में वे मा०भाऊराव देवरस की प्रेरणा से प्रचारक बन कर देशसेवा का व्रत लिया ।’शारीरिक में दक्ष, एक कुशल प्रचारक की उनकी ख्याति थी, यह अनुशासन जीवन पर्यन्त उनकी दिनचर्या का हिस्सा रहा।
परिवार में बड़े तथा एकमात्र पुत्र होने के कारण परिवार की भी जिम्मेदारी थी । भाऊराव की इच्छा थी कि वे विद्यालयी शिक्षा आगे बढ़ाएं,एक शिक्षक के रूप में परिवार की जिम्मेदारी निभाएं, परिवार के पोषण की चिंता करें। उनके निर्देश का पालन करते हुए, नित्यानन्द जी 9 वर्ष प्रचारक रहकर परिवार में लौटकर आये। आपने 1954 में भूगोल विषय से प्रथम श्रेणी में एम.ए. किया और अध्यापक की सामान्य सी नौकरी मिल गई अविवाहित रहते हुए शेष का पूरा समय संघ कार्य में लगाने का निश्चय किया।
वे कहते हैं,अपनी शिक्षा के अनुरूप अध्यापन कार्य ढूँढने के लिये लगभग 55 स्थानों पर आवेदन किया तब जाकर,उत्तर प्रदेश के जाट कालेज,बड़ौत में नौकरी मिली। बाद में अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में पढ़ाया। वहां उन्होंने पूर्वी राजस्थान पर अपनी पी.एच.डी. पूरी की। अपने मूलक्षेत्र ब्रजभूमि से सन्निकटता के कारण वे वीरभूमि राजस्थान से अनुप्राणित थे,अतः राजस्थान के ग्रामीण सैटिलमेंट पर उनका शोध प्रबन्ध था।
डॉ० नित्यानन्द जी 1970 मे पश्चिमी उ०प्र०, तत्पश्चात् मेरठ प्रान्त के प्रान्त कार्यवाह रहे। वे निरन्तर 30 वर्ष, सन् 2000 तक,लम्बे समय इस दायित्व पर रहे।एक कठोर अनुशासित स्वयंसेवक के रूप में उनकी पहिचान थी । शारीरिक प्रशिक्षण के लिये उनके काल खण्ड के देशभर में जो विशेषज्ञ थे,नित्यानन्द जी उनमें से एक थे ।
भूगोल विषय के अध्येता होने के कारण ‘देवभूमि हिमालय’ के प्रति उनके मन मे सहज श्रद्धा थी। 1965 में उन्हें प्रत्यक्षतः हिमालय के प्रवास, अध्ययन तथा सेवा का अवसर प्राप्त हुआ,जब वे देहरादून के प्रसिद्ध डी.बी.एस. पीजी कॉलेज में भूगोल विभागाध्यक्ष होकर आये। वे 1985 तक बीस वर्ष इसी पद पर रहे। एक भूगोलवेत्ता, हिमालय के जिज्ञासु, के रूप मे यह शैक्षणिक कालखण्ड अनेक छात्रों, शिक्षकों,शोधार्थियों, तथा योजनाकारों के लिये विशेष है। उनके अनेकों छात्र विभिन्न कॉलेजों में भूगोल विषय के शिक्षक बने तथा अनेक प्रशासनिक सेवा में वरिष्ठ अधिकारी के रूप मे रहे। जो उनके सम्पर्क मे आया, उसके जीवन में निश्चित परिवर्तन आया । वे अध्यापन के साथ – साथ संघ के प्रवास के लिये भी अनिवार्य समय निकालते थे। भूगोल के छात्रो की प्रयोगात्मक परीक्षा के लिये उनकी प्राथमिकता सदैव पहाड़ के विद्यालय ही रहे । छात्रो के मध्य बैठकर उनकी रुचि जानना,उन्हें हिमालय का महत्व बताना तथा विषय के प्रति उनके मन में ललक पैदा करना,यह उनका स्वभाव तथा उनके प्रयास थे।
महाविद्यालयी सेवा से निवृति के उपरान्त उनके वयोवृद्ध मार्गदर्शक भाऊराव देवरस ने उन्हें अपने पेतृक स्थान आगरा मे रहने का आग्रह किया, ताकि वे परिपक्व अवस्था में सुविधापूर्वक अपना लेखन,अध्ययन व दिनचर्या सम्पन्न कर सकें। वे कुछ समय तो आगरा रहे किन्तु फिर पहाड़ पर बिताया समय व उत्तराखण्ड के लिये कुछ और करने का अन्तर्मन उन्हें खींचकर यहाँ ले आया और देहरादून संघ कार्यालय का एक कक्ष उनकी सामाजिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया।
डॉ० नित्यानन्द जी ने 1962 में चीन द्वारा आक्रमण और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न समस्याओं पर विशेष अध्ययन किया,साथ ही तिब्बत पर भी गहन शोध किया। उनके शोधपत्र राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। उनका शोधपत्र अमेरिकी पत्रिका ‘The Annals of Association of American Geographers’ में प्रकाशित हुआ, जो एक बहुत ही सम्मानजनक बात है । उस समय के चुनिन्दा विद्वानों को ही यह प्रतिष्ठा प्राप्त थी। ‘The Holy Himalayas: A Geographical Interpretation of Garhwal’ उनके अनुभवों का एक विशेष ग्रन्थ है। यह ग्रंथ गढ़वाल हिमालय के सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक अध्ययन का विस्तृत वर्णन है तथा शोधकर्ताओं के लिए यह एक प्रमुख संदर्भ मार्गदर्शिका भी है।
भूगोल के साथ-साथ उन्होंने इतिहास का भी अध्ययन किया, गुलाब चंद, पन्निकर, सावरकर, और लोकमान्य तिलक जैसे भारतीय इतिहासकारों का उन्होंने विस्तार से अध्ययन किया। अपने गहन चिन्तन से ‘भारतीय संघर्ष का इतिहास’, ‘मुस्लिम तुष्टिकरण, विभाजन के पूर्व और पश्चात’, ‘उत्तराँचल प्रदेश क्यों? एक विवेचन’, ‘उत्तराँचल ऐतिहासिक परिदृश्य और विकास के आयाम’, उनकी प्रमुख रचनायें हैं। उनका मानना था कि एक राष्ट्र अपनी जीवन-रेखा अपने इतिहास से प्राप्त करता है,भारत का इतिहास पराजय का नहीं बल्कि देशहित संघर्ष और बलिदान का है,मातृभूमि के प्रति समर्पण का एक गौरवपूर्ण इतिहास है।
20 अक्टूबर 1991 की मध्यरात्रि उत्तरकाशी जिले की भागीरथी घाटी में आए भीषण भूकंप में जनजीवन को भारी नुकसान हुआ। डॉ०नित्यानन्द जी उस समय हरिद्वार प्रवास पर थे। भूकम्प की तीव्रता से उनको आभास हुआ कि उत्तराखण्ड में कोई बड़ी भूगर्भीय हलचल हुई है। जनसंचार की व्यापक सुविधाएं न होने के कारण पहले सरकारी घोषणा में कहा गया कि भूकम्प का केन्द्र अल्मोड़ा में है। तीसरे दिन जानकारी मिली कि केन्द्र अगोड़ा,उत्तरकाशी है,भूकम्प की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6.3 है, त्रासदी बड़ी है। डॉ० नित्यानन्द जी इस समाचार से बेचैन थे। उन्होंने तत्काल ही नकयुक्कों की एक बड़ी टीम जरूरी राहत लेकर उत्तरकाशी के लिये रवाना कर दी,साथ ही वरिष्ठ पदाधिकारियों, सहयोगियों से परामर्श कर, देश के सभी प्रान्तीय कार्यालयों को इस आपदा की प्राथमिक जानकारी दी गई। भूकम्प की इस त्रासदी का वर्णन पीड़ादायक है। प्रकृति के इस दंश का निवारण एक दुष्कर कार्य था। इसके लिये बड़ी शक्ति तथा दीर्घकालिक योजकता की आवश्यकता होगी,यह अनुभव किया गया। किन्तु अतीतकाल की चुनौतियो में संघ ने अपने संगठन कौशल्य के आधार पर जो सफलता प्राप्त की है,इस आपदा में भी राहत, व पुनर्निर्माण का संकल्प अवश्य पूर्ण होगा,यह संघ के कार्यकर्ताओं का विश्वास था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी सहयोगी संस्थाओं के द्वारा राहत और पुनर्वास के लिये ‘उत्तराँचल दैवी आपदा पीड़ित सहायता समिति’ का गठन किया गया। समिति के माध्यम से भागीरथी घाटी के इस विनाश में एक बड़ा राहत कार्य प्रारम्भ हुआ। देशभर की अनेक सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं ने देवभूमि पर आई इस विपत्ति में भरपूर सहायता की । उत्तरकाशी से गंगोत्री तक 60 ग्रामों के इस दुर्गम सीमान्त क्षेत्र, भागीरथी और जलकुर घाटी के ग्रामों में ध्वंश की एक दुखद कथा है। ऊपरी भागीरथी घाटी में नदी किनारे शायद ही कोई ग्रामीण घाट रहे होगे जहाँ मृतकों का दाह संस्कार न हुआ हो। अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ‘सेवाश्रम प्रकल्प’ के ठीक सामने भागीरथी पार विख्यात मनेरी बाँध की सुरंग के ऊपर बसे छोटे से ग्राम जामक मे भूकम्प की रात्रि को 72 लोग प्राण गँवा बैठे। जीवित वही रहा जो रात्रि में रामलीला देखने गया था, या जो किसी काम से गाँव से बाहर था।
भूकम्प के तुरन्त बाद उनके नेतृत्व में’, ‘उत्तराँचल दैवी आपदा पीड़ित सहायता समिति’ का गठन हुआ और राहत,पुनर्वास कार्य की देखरेख के लिये गंगोत्री यात्रा मार्ग पर सेवाश्रम के नाम से एक केन्द्र स्थापित किया गया।डॉ० नित्यानन्द जी ने इस परिसर को केशवपुरम् नाम दिया। 1991 से ही देश-विदेश से आने वाले तीर्थयात्रियों,संघ के स्वयंसेवको तथा ग्रामीण जनों का यहाँ आवागमन रहा है। डॉ० नित्यानन्द जी ने शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद स्वेच्छा से इस विपरीत जलवायु में यहाँ रहना स्वीकार किया। उनका तनमन इस आपदाग्रस्त भूभाग के लिये बहुत कुछ करने का बना था । कारण कि उन्हें अपने मातृ संस्था रा० स्व०संघ पर विश्वास था।उन्हें किसी ने भी इस कार्य के लिय निर्देशित नही किया, यह उनके मन का स्वतः संकल्प था । उन्होंने सातित्य के साथ पहाड़ के अध्येता के नाते, पुराने सम्बन्धों के आधार पर संघ के केन्द्रीय नेतृत्व का यह मन बनाने में सफलता प्राप्त की । कहा जा सकता है कि अभावो के इस विषम धरातल पर शून्य से प्रारम्भ कर उन्होंने देशभर के अनेक विधाऔ के विशेषज्ञ निर्माण के इस अभियान में जुटे तथा जोड़े गये ।
अपने सीमित संसाधनौ के आधार पर, समाज के सहयोग से,समिति ने इस सीमान्त विकास खण्ड के 10 गांवों में स्थानीय भवन निर्माण तकनीक पर आधारित 427 भूकंपरोधी भवन बनाए। इस सम्पूर्ण राहत और पुनर्वास की विशेषता यह है कि केवल सरकारी सहायता के बूते न रहकर, यहां के ग्रामीणों की इस कार्य मे बराबर की सहभागिता रही, ताकि उनके मन में स्वावलम्बन तथा स्वाभिमान का भाव जागृत रहे । भूकम्प से ध्वस्त सम्पूर्ण विकासखण्ड भटवाड़ी के ध्वस्त बीहड़ मार्गो पर पैदल चल कर समिति के कार्यकर्ताओ ने ऊँचाई के गाँवों तक राहत सामग्री पहुंचाई तथा सरकारी मशीनरी जो राहत कार्य में जुटी थी, उनका भी सहयोग किया । सबसे बड़ा सहयोग तो था, राहत दलों को गाँव की पगडंडियो,गाँव तक पहुच का मार्ग दिखाना । स्थानीय कार्यकर्ताओं, ग्रामीण सरस्वती शिशु मंदिरों के आचार्यो ने इस में बड़ी भूमिका निभाई ।
देशभर से अनेक सामाजिक संस्थायें राहत लेकर आयीं,कुछ गाँव गोद भी लिये, वे कुछ समय वहाँ रुकीं भी। किन्तु डॉ० नित्यानन्द जी का मन था कि इस तीर्थ क्षेत्र के विस्तृत किन्तु अविकसित भूभाग के लिये शिक्षा, स्वास्थ्य की दीर्घकालिक योजना के अन्तर्गत स्थानीय ग्रामीणजनों के साथ मिलकर अपने कार्यकर्ता विकास की रूपरेखा तैयार करें। भागीरथी तट पर स्थित,आधुनिक सुविधाओं से वंर्चत गाँव मनेरी को गतिविधि का केन्द्र बनाया गया । प्रारम्भ में इस प्रखण्ड के 60 गाँवों तक एकल शिक्षक विद्यालय चलाने का अभियान प्रारम्भ हुआ। इन छोटे छोटे शिक्षा केंद्रों ने समाज जागरण के बड़े परिणाम दिये है । स्वानीय बुवाओं को कार्य मिला और बच्चों को अच्छी शिक्षा तथा संस्कार ।
वर्तमान में ‘अपर भागीरथी घाटी ग्राम्य विकास प्रकल्प’ ‘केशवपुरम ‘के सचिव तथा बाल्यकाल से डॉ० नित्यानन्द जी के सहयोगी,ग्रामीण कार्यकर्ता श्री चतर सिंह बताते हैं कि, प्रकल्प के द्वारा 60 गाँवों की इस अपर भागीरथी घाटी में 6 ग्रामीण विद्यालय, 10 एकल शिक्षक विद्यालय, 5 छात्रावास, प्रकल्प केन्द्र सेवाश्रम तथा स्वरोजगार प्रशिक्षण केन्द्र संचालित हैं। इस योजना के अंतर्गत गढ़वाल हिमालय के चारों तीर्थों, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, तथा यमुनोत्री यात्रा मार्ग पर वर्तमान में नित्यानन्द जी की स्मृति में स्वास्थ्य की सभी सुविधाओं से युक्त ग्रामीण समाज तथा तीर्थयात्रियो की सुविधा के लिए चिकित्सालय संचालित हो रहे हैं। गत तीन दशकों में इस आयाम के प्रभावी परिणाम प्राप्त हुए हैं। समिति का कार्य संघ शाखा का सहायक और पूरक बना। गंगोत्री यात्रा मार्ग पर यह सम्पूर्ण गंगा घाटी संघ विचार से आच्छादित हुई है। साथ ही, यमुना घाटी, कमल घाटी, व टौंस घाटी के हिमाचल से सटे विकासखण्डों में सुदूरवर्ती छात्रों के लिये जो शिक्षा केन्द्र व छात्रावास स्थापित हैं, आज वे संस्कार वान युवा निर्माण के केन्द्र हैं। उदारमना समाज से उनके लिए छात्रवृत्तियों का भी प्रबंध किया गया है। डॉ० नित्यानन्द का मानना था कि छात्रावास की सामूहिक अनुशासित दिनचर्या छात्रों में जीवन मूल्यों और संस्कारों को प्रतिपादित करने का एक शसक्त माध्यम है, संघ जिस राष्ट्र-भाव के जागरण में लगा है, जिसकी अपेक्षा करता है,वह यहाँ सुलभ है। 1993 से संचालित छात्रावास योजना से हजारों की संख्या में पढ़कर निकले छात्र आज समाज जीवन के अनेक स्थानों पर अपनी सेवायें दे रहे हैं । यह भी अच्छा संकेत है कि अधिकांश संघ के विविध कार्यों से जुड़े हैं तथा अपने मूल प्रकल्प से भी । निर्धन तथा निर्बल ग्रामीण अंचल के लिये आर्थिकी का भी यह एक बड़ा सम्बल है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पू० सरसंघचालक श्री के एस सुदर्शन 23, 24, 25 अक्टूबर 2007 में ‘सेवाश्रम’ मनेरी’ आये थे। उनके प्रवास के अवसर पर आयोजित ग्रामीण विकास की गोष्ठी में उत्तराखण्ड प्रदेश तथा ऊपरी भागीरथी घाटी के ग्राम्य विकास में लगे कार्यकर्ता उपस्थित थे। मा०सुदर्शन जी तथा म० प्र० से पधारे, ग्राम विकास के राष्ट्रीय प्रमुख श्री सुरेन्द्र सिंह चौहान ने कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया। तीन दिवसीय इस आयोजन में इस छोटे से किन्तु दुर्गम सीमान्त विकास खण्ड,भटवाड़ी के सुदूर ग्रामों के 500 की संख्या का मातृ सम्मेलन, तथा1000 पूर्ण गणवेशधारी स्वयंसेवकों के विभिन्न शारीरिक कार्यक्रमों का प्रदर्शन हुआ। इस कार्यक्रम मे 2500 की संख्या में जनता भी उपस्थित थी,जो कि ऊपरी भागीरथी घाटी की कुल जनसंख्या की 8 प्रतिशत थी। आपदा राहत के कार्यों की यह एक बड़ी उपलब्धि है। पहाड़ के इस सुदूरवर्ती क्षेत्र के सेवा कार्य को देखकर सरसंघचालक जी बोले, सोचता हूँ,- “मैं यहाँ पहले ही क्यों नहीं आया?”
मध्य जून 2013 यात्रा काल में,केदारनाथ क्षेत्र में अतिवृष्टि के कारण जो आपदा आई उससे रुद्रप्रयाग जनपद की सम्पूर्ण मन्दाकिनी घाटी, उत्तरकाशी की गंगा घाटी तथा आसपास का विस्तृत क्षेत्र,बुरी तरह से प्रभावित हुए । यह सदी का एक बड़ा प्राकृतिक प्रकोप था । जिससे पहाड़ ही नहीं बल्कि पूरा देश भी आहत था । क्योंकि शायद ही कोई राज्य ऐसा होगा जिसका कोई भी तीर्थ यात्री प्रभावित न हुआ हो । साथ ही केदारनाथ की यह विपत्ति स्थानीय समाज को जो दंश दे गई ।आज भी घरों की चौरवटें अपने बिछुड़े स्जनों के लिये प्रतीक्षारत हैं। इस विषाद के निवारण में वर्षों लगेंगे, समाज का परस्पर का सहयोग ही इस दर्द को कम करने का दायित्व निभा सकता है ।
जहाँ एक ओर प्राकृतिक आपदा की भयावहता को समाज ने अपनी आँखौ से देखा,अनुभव किया। वहीं दूसरी ओर समाज ने संघ स्वयसेवको की जीवटता, सेवाभाव को भी प्रत्यक्ष देखा। उत्तरकाशी के भूकम्प राहत की भाँति पूरादेश तथा देवभूमि का धर्मप्राण समाज,’जहाँ कम,वहाँ हम’ के सिद्धान्त के साथ स्वयंसेवकों के साथ रहत, पुनर्वास में जुट गया। आज एक दशक से अधिक का समय भी इस त्रासदी के धावों को भरने में कम है । किन्त नित्यानन्द जी के मार्गदर्शन में राहत तथा पुनर्वास के जो प्रकल्प खड़े किय हैं,वे दीर्घकालिक सेवा के उदाहरण हैं। यहाँ विशेष उल्लेखनीय है कि गुजरात से चलकर तत्कालीन मुख्यमन्त्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी स्वयँ राहत सामग्री लेकर उत्तराखण्ड आये।अपने समाज बन्धवों के प्रति एक स्वयंसेवक के मन की संवेदना का यह अनुपम उदाहरण है।श्री मोदी नेआपदा की विस्तृत जानकारी के लिये देखरादून मे डॉ० नित्यानंदजी से भी भेंट की ।
इस आपदा में स्थानीय ग्रामीणो तथा स्वयंसेवकों ने राहत कार्य में सेवा की जो भूमिका निभाई,स्थान स्थान पर फँसे लोगो को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया,उन्हें अपन घर गाँव पहुंचाने की व्यव्यस्था में जो सहयोग किया,देशभर में उसका स्वागत हुआ।
डॉ० नित्यानन्द जी की हार्दिक इच्छा थी कि मेरे जीवन के अन्तिम समय में संघ प्रेरित’ इस सेवा कार्य की समीक्षा हो, पहाड़ के स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग का धन्यवाद हो इस नमित्त उनके मित्र,वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत कार्यकर्ताओं के उत्साह वर्धन के लिये इस घाटी के प्रवास पर आयें I 4 अक्टूबर,2013 को सरसंघचालक डाo मोहन भागवत निरन्तर वर्षा,विपरीत मौसम के बावजूद भी मनेरी पहुंचे ता। उन्होंने डॉ. नित्यानंद जी की इस इच्छा को पूरा किया। गंगा घाटी प्रकल्प,मनेरी द्वारा आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा,“मैं डॉ. नित्यानंद जी की प्रतिभा और उनकी कल्पना शक्ति से वर्षों पहले से परिचित हूँ,उनसे प्रभावित हूँ। उनका जीवन हम सबके लिए अनुकरणीय उदाहरण है।“डॉ० नित्यानंन्द जी प्रसन्न थे, सन्तुष्ट थे क्योंकि सरसंघचालक जी के आगमन पर उनका मनोरथ पूर्ण हो रहा था।
16 नवंबर 1995 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘ग्रामीण विकास’ कार्यों के लिए सम्मानित किया, इस भव्य समारोह में सम्मानित होने वाले दूसरे समाजसेवी ‘अन्ना हजारे’ थे ।कोलकाता के प्रसिद्ध संस्थान ‘बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय’ ने भी डॉ० नित्यानन्द जी के जीवन तथा रचनात्मक कार्यों को सराहा तथा उन्हें आमंत्रित कर सम्मानित किया।
डॉ. नित्यानंद जी ने अपने जीवनकाल में अनेक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना किया, फिर भी उन्होंने कभी काम से पीछे हटने का विचार नहीं किया। 1972 में गंगोत्री ग्लेशियर के अध्ययन के दौरान उनको पक्षाघात हुआ। 1981 में हृदय संबंधी बीमारी तथा अन्य गंभीर शारीरिक समस्याओं के बावजूद, वे निरंतर कार्य में जुटे रहे। अपने अंतिम दिनों में, जब स्वास्थ्य अत्यधिक कमजोर था,वे कहते थे-, “मेरा काम पूरा हो चुका है,अब मुझे यात्रा के लिए तैयार होना है।“
नित्यानन्द जी आपात्काल के लोकतन्त्र सेनानी थे । आपातकाल 1975 में डॉ० नित्यानन्द जी पुलिस की सूची में वाँछित थे । संघ के प्रान्त कार्यवाह होने के कारण देहरादून पुलिस को उनकी तेजी से तलाश थी । पुलिस उनके निवास पर कई बार आई किन्तु वे भूमिगत थे । तथापि वे निरन्तर कालेज जाते थे । ताकि छात्रों की पढ़ाई मे व्यवधान न हो । एक अनुशासित अध्यापक तथा भूगोल के सक्षम विभागाच्यक्ष होने के नाते उनकी प्रतिष्ठा थी, सम्मान था । प्रधानाचार्य नहीं चाहते थे कि वे गिरफ्तार हों। अन्ततः संगठनकी योजनानुसार, सायँ कालीन शाखा के विद्यार्थियो के साथ उन्होंने सत्यग्रह किया और गिरफ्तारी दी । वे आपातकाल के पूरे समय कारगार में निरुद्धरहे ।” होलि हिमालया” जिस ग्रन्थ के वे रचयिता हैं, उसके लेखन का सु अवसर उन्हें जेल मे ही मिला ।
उनका सतत् अग्रह रहा कि हियालयी क्षेत्र में जनचेतना का संचार करने वाले श्रीदेवसुमन, वीर केसरी चन्द, वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली, पं० नैनसिंह रावत, गौरादेवी, माधोसिंह मण्डारी सदृश मनीषियों के कार्य पठ्यक्रम में जोड़े जाने चाहिएं । वे 1962 मे प्रवास के समय मलेथा में रुके थे । उन्होंने उस गूल (नहर ) को भी देखा जिसके निर्माण में माधोसिंह भण्डारी के पुत्र के बलिदान की कथा जुड़ी है। उनका मत था कि इतिहास में समर्पण का यह ज्वलन्त उदाहरण है। इस ऐतिहासिक घटना का एकाँकी बने और छात्रों के मध्य उसका प्रभावी मंचन ही, उनका अग्रह रहा है
एक भूगोलवेत्ता तथा ग्राम विकस की सोच के कार्यकर्ता के रूप में उतराखण्ड हिमालय के समग्र विकास के बारे में उनका चिन्तन स्पष्ट था । उनका मत था कि यहाँ विकास के सब साधन दून, तराई तथा भाबर में ही सिमटकर रह गये हैं। जबकि पहाड़ का ऊपरी हिस्सा, सीमान्त का क्षेत्र अभी जीवन की सामान्य सुविधांओं से अभी वंचित है। प्रदेश में निवास करती विभिन्न जन जातियों तथा दूर दराज के ग्रामों के उत्थान की ओर भी उनका विशेष ध्यान था।
देहरादून में रहते हुए, जनपद के पर्वतीय भूभाग जौनसार – बावर में सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक सरस्वती शिशुमन्दिर प्रारम्भ कराने तथा उनके पोषण की ऱ्यवस्था में डॉ० नित्यानन्द जी की बड़ी भूमिका है। ये विद्यालय आज शिक्षिक उन्नयन तथा सामाजिक चेपना के प्रभावी केन्द्र बने हैं।
डॉ० नित्यानन्द जी स्वभाव से दृढ़,अनुभवी तथा अपने विषय के तज्ञ, सहयोगी वृत्ति के व्यक्ति थे । इस कारण समाज के अनेक जन समय समय पर उनसे मिलने, चर्चा करने आते रहते थे । हम उत्तराखण्ड हिमालय की रचना साधना में लगे जितने भी समकालीन शीर्ष जनों को जानते, पाहिचानते है, उन सभी से नित्यानन्द जी की निकटता थी,वे सहज, स्नेह माक से मिलने आते तथा सन्तुष्ट होकर लौटते ।
डॉ० नित्यानन्द जी ने अपनी माता जी के नाम से जो ट्रस्ट गठित किया था, वह आज भी सतत् रूप से आवश्यकता जनित छात्रों को अध्ययन के लिये सहयोग करता है। टूस्ट की वरिष्ठ सदस्य, बाल्यकाल से डाँ० नित्यानन्द जी के सानिध्य में पली बढ़ी उसकी भानजी डॉ० माधुरी शर्मा बताती हैं कि मामाजी की प्रेरणा से इस ट्रस्ट में परिवार के सभी सदस्य सेवाभाव से योगदान करते हैं ।
नित्यानंद जी ने एक सन्त के भाव से वसीयत भी लिखी, जिसमें उन्होंने अपने विचारों को एक समाजसेवी के रूप में व्यक्त किया। उन्होंने लिखा, “मेरे पास निजी संपत्ति नहीं है, मैंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा भागीरथी के किनारे बिताया है, मेरी इच्छा है कि, मेरी जीवन यात्रा भी यहीं समाप्त हो”। 8 जनवरी 2016 को 90 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके द्वारा किये गये सेवाकार्य ही उनकी पूँजी है, उनकी प्रेरणा हिमालय तथा हिमालय वासियों के लिये अमूल्य निधि है।
डॉ. नित्यानंद जी की मृत्यु पर भागीरथी घाटी के सीमान्त विकासखंड भटवाड़ी के ग्रामीण लोग उनकी जीवन यात्रा के अन्तिम समय हजारों की संख्या में एकत्रित हुए तथा अपने मार्गदर्शक के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त की।
समाजसेवी कार्यकर्ता के नाते उन्होंने हिमालय की सेवा के लिए जीवन लगाया। भविष्य में उनके द्वारा किये गए कार्यों का जो मूल्यांकन होगा,वह पहाड़ के युवाओं, शिक्षाशास्त्रियों तथा योजनाकारों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा तथा आगे आने वाली पीढ़ी को प्रेरित करता रहेगा। देहरादून के दून विश्वविद्यालय के परिसर में उनके शोध कार्यों के अध्ययन के निमित्त “डॉ नित्यानन्द हिमालयी अध्ययन एवम् शोध सस्थान” स्थापित किया गया ।