एकनाथ रानाडे की संकल्प साधना से मूर्त हुआ शिला-स्मारक:

आशा कोठारी

देहरादून

गत एक सप्ताह से कन्याकुमारी में सागर स्थित विवेकानन्द शिला स्मारक चर्चा में है। कारण यह कि प्रधानमंत्री वहाँ साधनारत हैं। यह उनका स्वभाव है, इसकी प्रशंसा की जानी चाहिये, अस्तु॥

संघ के समर्पित कार्यकर्ता तथा गुरु गोलवलकर जी के अनन्य सहयोगी, १९२६ से विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करने वाले श्री एकनाथ रानाडे के दृढ़ संकल्प से ही विलक्षण तीर्थ विवेकानन्द शिला स्मारक का निर्माण हुआ। स्मरण रहे, १९६३ में पूरे विश्व में स्वामी विवेकानन्द जी की जन्म शताब्दी मनाई गई। एकनाथ जी विवेकानन्द जी के आध्यात्मिक अधिष्ठान के मनन में लीन थे। उनके मन में पल रहे विचार को पू० गुरूजी का सानिध्य मिला और आभियान आगे बढ़ चला।

वर्ष १९६४ का समय था। तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व० लालबहादुर शास्त्री इस राष्ट्रीय कार्य के लिये तन मन से साथ थे। तटीय क्षेत्र होने के कारण नौसेना से अनापत्ति भी अनिवार्य थी। स्मारक ट्रस्ट द्वारा देश भर से प्रतिव्यक्ति मात्र एक रु॰ के सहयोग का अभियान चलाया गया। एकनाथ जी ने देश के प्रत्येक साँसद से भेंट की, सम्पर्क किया। मात्र ९ वर्ष के अखण्ड परिश्रम से १९७२ में राष्ट्रपति वी०वी० गिरि के कर कमलों से देश भर के समाज-शिल्पियों की उपस्थिति में शिला स्मारक का लोकार्पण सम्पन्न हुआ। निर्माण के बीच में इस कार्य का अवलोकन करने अपने कार्यकर्ता की सतत् चिन्ता करने वाले सरसंघचालक गुरु गोलवलकर जी भी यहाँ आते रहे।

उल्लेखनीय है कि शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन से लौटकर स्वामी विवेकानन्द/नरेन्द्र नाथ दत्त ने यहीं तमिलनाडु की धरती का प्रथम आलिंगन किया था, उनके शब्द थे, मातृभूमि से दूर रहकर यदि कोई विकार आया होगा तो भारत माँ के आँचल से लिपटकर कर मैं पावनता का अनुभव कर रहा हूँ।

वर्ष १९८१ में संघ की अखिल भारतीय जिला प्रचारक बैठक बंगलौर में हुई, तब नरेन्द्रभाई भी संघ प्रचारक के नाते, अहमदाबाद से इस बैठक में सहभागी थे। इस आयोजन में श्रद्धेय एकनाथ रानाडे पूरे समय उपस्थित थे। उनसे भेंट, दर्शन तो तीनों दिन हुए किन्तु उनका उद्बोधन नहीं हुआ। जानकारी दी गई कि वे शिला स्मारक की कार्य सिद्धि के बाद दो वर्ष मौन व्रत पर रहे। मौन का क्षण प्रारम्भ होते ही उन्होंने इतना भर कहा, मौन अर्थात् मौन। व्रत के पूरा होने के बाद शरीर के विविध अंगों में शिथिलता आई। उनके नेत्रों और वाणी में कुछ समय के लिये अवरोध भी आया।

एकनाथ जी के आमन्त्रण पर बैठक की पूरी टीम दो दिन के लिये कन्याकुमारी गई और तपस्वी एकनाथ जी के सानिध्य में विवेकानन्द शिला स्मारक के दर्शन, अध्ययन का सौभाग्य रहा। देशभर के अपने मित्रों के मध्य बैठकर जो शब्द उनके मुख से निकलते, उनमें स्वामी विवेकानन्द जी, अपने मार्गदर्शक श्री गुरुजी तथा इस असाध्य निर्माण की चर्चा आते ही उनकी आँखें नम हो जातीं। भारत का अन्तिम छोर, कन्याकुमारी का यह तटीय भाग, यहाँ मछुवारों का बाहुल्य है, वर्षों से ईसाइयत के प्रचार, प्रभाव से ग्रसित है, इसीलिये इस राष्ट्रीय आभियान में अनेकों विरोध, अवरोध खड़े हुए, साथ ही राजनैतिक षड्यंत्र भी हुए। आज यह संस्थान विवेकानन्द केन्द्र के नाम से देश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा के अनेक सेवा कार्य संचालित करता है।
अगस्त १९८२ में श्री एकनाथ जी अपने जीवन का ध्येय पूर्ण कर स्वर्गलोक को चले गये। सागर की गोद में स्थित यह शिला स्मारक स्वामी विवेकानद जी की जीवन गाथा के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्रद्धेय एकनाथ रानाडे के पुरुषार्थ की भी चर्चा करता रहेगा॥