देहरादून
प्रेम बड़ाकोटी

हिमालय !
पर्वतराज, नगाधिराज !
सृष्टि का ध्वज-दण्ड,
पृथ्वी का मानदण्ड,
विश्व में विशालता का पर्याय,
भारत का सजग प्रहरी,
अकूत सम्पदाओं का निकेत ।
इसके अंक में,आकृति में,
दूर तक फैली पर्वतमालाएं,
गगनचुम्बी विस्तृत श्रृंखलाएं,
समीपस्थ देशों से सटी सीमायें ।
साक्षात् महामानव !
गुणसम्पन्न,वह उदात्त है,
इसे सदैव !
देवभूमि का गौरव प्राप्त है ।
यह,
उच्चादर्शों का प्रतिपालक,
जीवनरक्षक, महानायक ।
इसके आँगन में पलता निष्ठा का यौवन,
दुष्कर झंझावातों में भी,अडिग जीवन।
किन्तु यहाँ,
प्रकृति के बीच,
संघर्षों से जूझता,आपदाओं को झेलता,
अभावों को गले लगाता,
समस्याएं अनन्त,असंख्य हैं,
सच यह है,
कैनवास पर पहाड़ का चित्र,
सुन्दर दिखता है,आकर्षक लगता है,
पर, भीतर की अनुभूति ?
अभाव,आपदा,निर्जनता से ग्रसित,
अव्यवस्थाओं के दंश से व्यथित,
समाधान को चिर प्रतीक्षित ।
यहाँ पहाड़ पर,
विकास की सम्भावनाएं असीमित है,,
विषम धरातल, दुर्गम परिवेश,
क्या यह, पिछड़ेपन का कारण है?
यह प्रश्न अकारण है।
भविष्य इस बात का साक्षी होगा,
कि, इसका दुर्गम, दुष्कर आकार
प्रकृति का वरदान है,
वैशिष्ट्य है, पहचान है।
जो विशालता, विविधता
इसके आँचल में व्याप्त है,
इन्हीं कारणों से, इस वन्य क्षेत्र को,
देवभूमि का गौरव प्राप्त है।
इसका प्रत्येक कण जीवमान है,
इसमें इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र,
सब विद्यमान है।
आज आवश्यकता है,
हिमालय पर सम्पदा संरक्षण को,
हिमालय की अक्षुण्णता की,
इसका स्वत्व,
इसके संरक्षण, संवर्धन की,
यदि देवभूमि के प्रति ममत्व है,
तो फिर,
विकास,उत्थान, उन्नयन,
वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है॥