खनन सुधारों से माफिया तंत्र की कमर टूटी, इसलिए हो रहा है दुष्प्रचार

देहरादून:

आशा कोठारी

उत्तराखंड में खनन क्षेत्र लंबे समय तक अव्यवस्था, अपारदर्शिता और प्रभावशाली हित समूहों के शिकंजे में रहा।
अवैध खनन, राजस्व की चोरी और नियमों की अनदेखी से राज्य को आर्थिक नुकसान तो हुआ ही, साथ ही पर्यावरण और सामाजिक संतुलन पर भी गंभीर दुष्प्रभाव पड़े।

परंतु वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री बनने के बाद पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड सरकार द्वारा खनन क्षेत्र में किए गए व्यापक और संरचनात्मक सुधारों ने इस पूरे तंत्र को बदलने की दिशा में निर्णायक कदम उठाए, जिसके परिणाम भी दिखने लगे हैं।

नई नीतियों के तहत जहां खनन पट्टों की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया गया वहीं तकनीक आधारित निगरानी भी लागू की गई और अवैध गतिविधियों पर व्यापक सख्ती की गई।

ई-टेंडरिंग, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और नियमित निरीक्षण जैसी व्यवस्थाओं द्वारा यह स्पष्ट संदेश गया कि अब खनन क्षेत्र में मनमानी और गैरकानूनी गतिविधियों के लिए कोई स्थान नहीं है।

इन सुधारों का सीधा और ठोस परिणाम यह रहा कि 2021 के बाद खनन क्षेत्र से राज्य के राजस्व में निरंतर और उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

जहाँ पहले अवैध गतिविधियों के कारण सरकारी खजाने को भारी नुकसान होता था, वहीं पारदर्शी व्यवस्था के चलते राजस्व संग्रह में रिकॉर्ड सुधार हुआ है।

पहले जहाँ खनन क्षेत्र से राज्य को लगभग 300 रुपए से 350 करोड़ रूपये प्रति वर्ष ही राजस्व मिलता था वहीं धामी सरकार द्वारा लागू किए गए खनन सुधारों के बाद वित्त वर्ष 2024-25 में यह राजस्व बढ़कर लगभग 1,040.57 करोड़ रूपये तक पहुँच गया और वित्त वर्ष 2025-26, में अब तक ये आंकड़ा 500 करोड़ रूपये को पार कर गया है।

राज्य सरकार द्वारा खनन क्षेत्र में किए गए सुधारों की केंद्र सरकार ने भी खुले तौर पर सराहना की और पिछले दिनों उत्तराखंड को खनन सुधारों, पारदर्शिता और बेहतर प्रशासनिक प्रदर्शन के लिए 200 करोड़ रूपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की।

ये इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राज्य का मॉडल केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभावी और लाभदायक है।

पर इन सुधारों का सबसे बड़ा असर उन खनन माफियाओं और उनके सफेदपोश संरक्षणकर्ताओं पर पड़ा है, जिनकी वर्षों से चल रही ‘रोज़ी-रोटी’ अचानक बंद हो गई।

जिन समूहों ने नियमों की आड़ में या प्रभाव का उपयोग कर अवैध लाभ कमाया, वे अब जवाबदेही के दायरे में आ गए हैं।
यही कारण है कि ऐसे तत्व आज बेचैन हैं और सरकार व मुख्यमंत्री को बदनाम करने के लिए दुष्प्रचार का सहारा ले रहे हैं।

यह समझना ज़रूरी है कि सुधारों से असंतुष्ट लोग अक्सर भ्रम फैलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि धामी सरकार के कार्यकाल में खनन सुधार लागू करने के पश्चात जहां एक ओर राज्य का राजस्व बढ़ा है वहीं पर्यावरणीय संतुलन की रक्षा के लिए ठोस कदम भी उठाए गए हैं।

आज जो लोग हताश होकर शोर मचा रहे हैं, वे असल में उस पुराने तंत्र की वापसी चाहते हैं, जिससे राज्य को प्राप्त होने वाले राजस्व के साथ- साथ पर्यावरण का भी नुकसान था।

2021 के बाद खनन क्षेत्र में राज्य का बढ़ता हुआ राजस्व और केंद्र सरकार से मिला 200 करोड़ रूपये का प्रोत्साहन इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि धामी सरकार की नीति भी ठीक है और नीयत भी।

दुष्प्रचार चाहे जितना हो, लेकिन तथ्यों और परिणामों से साफ है कि राज्य में अब खनन क्षेत्र प्रोफेशनल, पारदर्शी और नियमबद्ध तरीके से चल रहा है।

परंतु अवैध तंत्र पर सख्ती के कारण जिनकी अवैध कमाई पर लगाम लगी है, वे अब बिलबिला रहे हैं
क्योंकि एक तो उनकी अवैध कमाई चली गई और दूसरा, उनके सिर पर हाथ रखने वाले सफेदपोश नेता और अधिकारी भी अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के फैसलों को गलत सिद्ध नहीं कर पा रहे हैं।
देखते हैं अब ये खनन का ऊँट किस करवट बैठता है!