” प्रात: स्मरणीय श्री डिम्मेश्वर प्रसाद कोठारी जी को अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि सादर समर्पित “‘

देहरादून:

आशा कोठारी

देहिनोऽस्मिन् यथादेहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ।।
“‘ जगधार गांव के मूल निवासी कोठारी वंशज पण्डित वर्य स्व० श्री बलराम कोठारी जी के सुपुत्र स्व० श्री लच्छी राम कोठारी जी के चार सुपुत्रों में ज्येष्ठ सुपुत्र अब प्रातः स्मरणीय श्री डिम्मेश्वर प्रसाद कोठारी जिन्हें क्षेत्र ही नहीं सम्पूर्ण जनपद के लोग एक कर्मठ व्यक्तित्व के रूप में जानते हैं, आदर्श शिक्षक एवं सुयोग्य अभिभावक और अभी हाल में एक श्रम साध्य कार्य जगधार गांव की वंशावली का अनूठा कार्य पूरा ही किया था कि अचानक 14 सितम्बर 2025 को अपना भरा-पूरा परिवार छोड़ कर अपनी अर्द्धांगिनी श्रीमती प्रेम वती कोठारी की गोद में अपना सिर रखकर अपने तीनों सुपुत्रों व पुत्र वधुओं श्री राकेश कोठारी श्रीमती सावित्री कोठारी, श्री रमेश कोठारी श्रीमती नीलम कोठारी व श्री राजेश कोठारी श्रीमती आशा कोठारी को अपना उत्तरदायित्व देकर चिर निंद्रा में सो गए। क्या अनूठा संयोग था कि तीनों भाई श्री दयाराम कोठारी श्रीमती सत्यभामा कोठारी, श्री अनन्त राम कोठारी श्रीमती धनादेवी अपनी अपनी सहधर्मिणी सहित व श्री रोशन लाल कोठारी सभी अपने अपने सुपुत्रों व सुपुत्रियों सहित श्री मनीष व उनकी धर्म पत्नी श्रीमती लक्ष्मी, व पंकज कोठारी, आरती, भारती, पूजा व किरन तथा अपने पौत्र पौत्री श्री अतुल, अक्षत, सौरभ व आयुष्मति पूनम, स्नेहा व दीपिका जो श्री गुरु जी के इर्द-गिर्द ही इस अलौकिक, अविस्मरणीय महाप्रयाण के साक्षी बन रहे थे। साथ ही श्री मनीष के सुपुत्र सिद्धार्थ व सुपुत्री सानवी भी इस महा प्रयाण को एक टक देखते ही रह गए, शायद अपने दादा जी की कुछ सहायता करना चाहते हों, इस अपरिहार्य स्थिति को परिवर्तित करने से वंचित ही रह गए।’
‘ मेरा मानना है कि जिसने भी इन पहाड़ी कन्दराओं से प्रवास किया, छोड़ा! उसी ने अपनी उन्नति के पट खोले, ‘यह ध्रुव सत्य भी है’ और पलायन का मुख्य कारण भी। “‘
” आप जैसे विद्वान व्यक्ति से बहुत दिनों का साथ रहा, सम्बन्ध घर जैसा रहा। सेवा निवृति के बाद जब भी आप मिलते तो अपने घर आने का निमंत्रण अवश्य देते कि कभी बैठिए कुछ आपबीती पर चर्चा करेंगे, परन्तु आज मन को यह व्यथा कष्ट दे रही है, कि उन महत्वपूर्ण छणों को अपनी आलस्यता के कारण गंवाया, अब पश्चाताप के अतिरिक्त और रहा भी क्या है? जब आपका जीवन इस असार संसार से विदा होने का दु:खद समाचार जाना तब लगा कि कितनी बड़ी भूल हुई कुछ समय आपके साथ आपके घर पर बैठने का समय न निकाल पाया। पछतावा अब! जब आपका पांचभौतिक शरीर यश शरीर में विलीन हो गया। अब तो केवल समझौता ही रह गया है–
समझौता गमों से कर लो।
जिन्दगी में गम भी मिलते हैं।
पतझड़ आते ही रहते हैं।
ये मधुबन फिर भी खिलते हैं।
मन में टीस रहेगी मधुबन खिलते हैं या नहीं यह तो भविष्य के अन्तराल पर निर्भर है। पर– ! ! सहयोगी, प्रेमी, मिलन सार, परोपकार की भावना से ओत-प्रोत, दानी व ईश्वर के प्रति अगाध आस्था के धनी थे आप। तभी तो अपने गांव के इष्ट देवता घण्डियाल व मां जगदम्बा के भव्य मंदिर का निर्माण करवा कर आगन्तुक भक्तों की सुव्यवस्था हेतु स्वेच्छा से यथेष्ठ परिश्रम कर सहयोग करते रहे, यह थी आपकी उदारता व नि:स्वार्थ प्रीत भावना। आपका इस संसार में आना एक उत्सव था कोई माने या न माने पर श्री कृष्ण की भांति आप का उदय सूर्य का सिंह राशि में व चन्द्रमा का कर्क राशि में रहने पर हुआ, 29 अगस्त सन् 1943 का वह मधुरिम दिन आज भी जन जन के हृदय पटल में अंकित है। आज आपको खोकर सब स्मृति पटल पर अंकित हो रहा है, आप ने ही अवगत करवाया कि अपने गुरुवर स्व० श्री चन्द्र मणि बहुगुणा जी के घर पर जब उनके द्वारा एक व्यक्तिगत विद्यालय रानी चौरी में चलाया जा रहा था, व उनका कक्षा आठ का प्रथम बैज था जिसमें मात्र छः विद्यार्थी थे सभी अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए थे, इसी के बाद मैं भी शिक्षण के धर्म में प्रवृत्त हुआ। प्रथम नियुक्ति अप्रशिक्षित काल में सन् 1962 में बेसिक पाठशाला भिलंग में हुई। 1964 में JTC प्रशिक्षण प्राप्त कर वगासूधार, पुजार गांव सकलाना, नागराजा धार नगुण, नागदेव पथल्ड, डुण्डा, पुजार गांव सकलाना, नागराजा धार बमुण्ड, पदोन्नति पाकर द्वारिखाल पौड़ी, छापराधार, इसके बाद सेवा निवृति 2005 तक राजकीय इण्टर कॉलेज रानी चौरी में रहे। आपका स्वभाव श्रद्धा भाव से युक्त रहा, भगवान श्री कृष्ण की गीता को आपने अपने जीवन में उतारा व तदनुरूप कर्म पर विश्वास किया, यह थी आपकी महानता। “‘
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु।।
“‘ जगधार की प्रतिष्ठा को बढ़ाने में आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा, जहां अनेकों विभूतियां हुई उन्हीं दिव्यात्माओं के वंशज आप ने जीवन में कभी हार नहीं मानी। कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर आप वास्तव में मानवता से परिपूर्ण थे जबकि आज के परिवेश में मानव मानव को देखने- समझने, सुनने व मानने के लिए तैयार ही नहीं है वहां आप हर व्यक्ति को पूर्ण सहयोग व सम्मान प्रदान करने में कोई कोर कसर नहीं रखते थे । सम्भवतः आप जानते थे कि काम, क्रोध व लोभ नरक के द्वार हैं, अतः आप इन तीनों शत्रुओं से सदैव सावधान रहते थे । “‘
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: ।
काम:क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ।।
“‘ क्या अलौकिक जीवन रहा आपका ऐसे व्यक्तित्व के धनी महामानव के जाने से जो अपूरणीय क्षति हुई उसकी भरपाई असम्भव है। ऐसी विभूति को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कोटि-कोटि नमन करता हूं तथा ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि दिवंगत आत्मा को शान्ति प्रदान करेंगे साथ ही शोक संतप्त परिवार व परिजनों को इस महान दु:ख को सहन करने की शक्ति भी प्रदान करेंगे। यह इतना महान कष्ट है कि भुलाएं भी भूला नहीं जा सकता है, ब्रह्मलीन दिवंगत आत्मा की आत्मिक शान्ति की प्रार्थना करता हूं तथा दिवंगत विभूतियों को अपने श्रृद्धासुमन अर्पित करते हुए इस अपरिहार्य परिस्थिति से सबकी कुशलता की प्रार्थना करता हूं । यद्यपि यह भी समझता हूं कि यह शाश्वत सत्य है पर नर देह के कारण किसी भी मानव के जाने की वेदना शालती ही रहती है । “‘
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।
ॐ शान्ति, ॐ शान्ति, ॐ शान्ति, ॐ — सादर