देहरादून:

आशा कोठारी

* वर्ष 1975 तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी द्वारा देशपा थोपा गया आपातकाल, लोकतन्त्र पर एक बड़ा आघात था, संविधान में नागरिक अधिकारों का हनन था। उसके विरोध में लोकनायक जयप्रकाश नारायण, नानाजी देशमुख, श्री लालकृष्ण आडवाणी, जार्ज फर्णाण्डीज आदि के नेतृत्व में एक लाख से अधिक राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता, विद्यार्थी जिनमें RSS के स्वयंसेवक बहुतायत में थ, उन्होंने सत्याग्रह किया, गिरफ्तार हुए तथा मार्च 1977 आपातकाल हटने तक अनेक प्रकार से शारीरिक मानसिक उत्पीड़न सहा । 3त्तराखण्ड सरकार ने आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर, इस विषय को संज्ञान में लेकर विधानसभा में लाने का तय किया है। गैरसैण में होने वाले सत्र में इसका प्रारूप, इस पर चर्चा प्रस्तुत की जायेगी । आपातकाल के लोकतन्त्र सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ती प्रेम बड़ाकोटी का कहना है कि,आपातकाल के बीते 50 वर्षों में कभी भी संघर्षरत इन कार्यकर्ताओं ने सरकार, शासन से किसी सुविधा की माँग नहीं की । हमने संकटकाल में करार सहते हुए राष्ट्रीय दायित्व का पालन किया, बस इतना सा भाव मन में है। आपातकाल के इस राष्ट्रीय के विषय का संज्ञान तथा इसको सरकार मान्यता दे संज्ञान में लाये यही केवल अपेक्षा थी। गत वष भारत सरकार के गृह मन्त्रालय ने इस विषय पर राजाज्ञा जारी की थी। इस पर Act बने और प्रतिवर्ष २५ जून को जनतंत्र के सन्दर्भ में आपातकाल के काले अध्याय पर सजगता के साथ चर्चा हो तथा समाज में लोकतंत्र के संरक्षण का योग्य सन्देश जाये,यह आशय तथा अपेक्षा है। क्योंकि १९ ७५ का आन्दोलन जनतन्त्र को बचाने का संघर्ष था। ५० वर्षों के अन्तराल उपरान्त सरकार का यह निर्णय सुखद है, स्वागत योग्य है। इस साहिसिक कदम के लिये लोकतंत्र सेनानियों के परिवारजन धामी सरकार के लिए अनन्त साधुवाद व्यक्त करते हैं।।
* -प्रेम बड़ाकोटी