हिमालय के अध्येता, भूगोलवेत्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जीवनव्रती कार्यकर्ता डॉ० नित्यानन्द जी ने वर्ष १९६५ से ही उत्तराखण्ड हिमालय के सन्दर्भ में जो सजगताएं इंगित की थीं हिमालय के विषय पर जो आग्रह किया था, वह उनका अध्ययन था, अनुभव था। उसकी उपेक्षा का दुष्परिणाम है,- प्रेम बड़ाकोटी

देहरादून

आशा कोठारी

अपर भागीरथी घाटी में, माँ गंगा के शीतकालीन तीर्थ, ‘मुखवा’ के सन्निकट यात्रा मार्ग पर स्थित सुक्खी, धराली, सैन्य क्षेत्र हर्षिल तक जल त्रासदी से पीड़ित है। पूरा गंगोत्तरी मार्ग क्षत-विक्षत है। शासन, प्रशासन, सेना, तथा स्थानीय ग्रामीण, राहत बचाव कार्य में लगे हैं। समाचार माध्यमों से जानकारी अपडेट हो रही है।

१९९१ के विनाशकारी भूकम्प में भी भागीरथी घाटी ने आपदा के उस दंश को झेला था। इस भटवाड़ी विकास में चारों ओर ध्वंश का ताण्डव था, यहाँ की वर्तमान पीढ़ी ने अपनी आँखों से उस विषम काल को देखा है।

हिमालय के अध्येता, भूगोलवेत्ता, समाजसेवी, तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जीवनव्रती कार्यकर्ता डॉ० नित्यानन्द जी ने वर्ष १९६५ से ही उत्तराखण्ड हिमालय के सन्दर्भ में जो सजगताएं इंगित की थीं, समय-समय पर युवाओं के मध्य जाकर हिमालय के विषय पर जो आग्रह किया था, वह उनका अध्ययन था, अनुभव था। उसकी उपेक्षा का दुष्परिणाम है,- जनहानि और देवभूमि पर त्रासदी। उनके शोधग्रन्थ “होली हिमालया” में इसका विस्तृत वर्णन है। भागीरथी घाटी में सक्रिय मार्गदर्शक के रूप में उन्होंने शारीरिक कष्ट तथा विपरीत परिस्थितियों में भी मनेरी में केन्द्र बनाकर निरन्तर जीवन के २५ वर्ष लगाये।

उनके प्रयास से इस सम्पूर्ण घाटी के ६० ग्रामों के विस्तृत क्षेत्र में एकल शिक्षक विद्यालय, संस्कार केन्द्र स्थापित हुए। इनके द्वारा समार्पित कार्यकर्ता तैयार हुए तथा ग्राम ग्राम में सेवा, स्वावलम्बन का भाव जाग्रत हुआ। १९१३ की केदारनाथ आपदा में भी इन कार्यकर्ताओं की उल्लेखनीय भूमिका थी।

हर्षिल, धराली की इस जल त्रासदी में ये ग्रामीण जन, युवा स्वयंसेवक प्राण प्रण से सहयोग मे जुटे हैं, अस्तु।

– प्रेम बड़ाकोटी