आशा कोठारी
देहरादून

प्रतपस्चार्य में डालनेवाली अष्ट – सिद्धियों की चर्चा बहुत प्रसिद्ध है,लेकिन इससे भी अधिक विघ्नकारी और तपस्या बाधक तुस्टियों के प्रति साधक बहुधा असावधान ही रहते हैं,*तुष्टि * वस्तुत:मार्ग को छोड़ देना तुष्टियां नौ प्रकार की होती हैं,ओर उन्हे दो भागों में विभक्त किया गया है,1)ज्ञानेंद्रियों से सम्बंधित पांच तुष्टियोंं बाह्य तुष्टि कहते हैं,जिसका लक्ष्य होता है, कि साधक को आत्म ज्ञान की ओर बढ़ने नही देना,उसे पहले ही बाहरी विषयों में उलझा कर साधना मार्ग से हटा दिया जाय,2) समूह की चार आध्यात्मिक तुष्टियाँ ये हैं,जो उन साधकों को पथ भ्रष्ट करती हैं,जिनमे जड़ चेतन,सत असत का विवेक है,लेकिन एसे साधकों झूठे भरोसों का बहाना दे कर ये तुष्टियां उन्हे आत्मज्ञान के मार्ग से हटा देती है,
बाह्य तुष्टियां शब्द,रूप,रस और गंध आदि विषयों से जुड़ी है,ये साधक को इन भ्रमों में उलझा देती है, कि विषयों के उपार्जन मे दुःख है,उपार्जित विषयों की रक्षा में दुःख है,विषयों के बार बार भोग का परिणाम भी दुःख है,विषयों के उपार्जन,रक्षाऔरभोग प्रत्यक्ष रूप से हिंसा की ओर ले जाते हैं,अत: प्रतीक प्रकारकी विषय शक्ति इस प्रकारके साधक दूर रहना चाहते हैं, और सोचने वाले हैं कि संसार में स्वत:उपलब्ध पदार्थों में तुष्टि का अनुभव किया जा सकता है,इस प्रकार के साधक आत्मज्ञानके मार्ग का अनुसरण नही करते ,क्योंकि वे साधना के उपक्रम को विषय शक्ति ही मानते हैं,प्रकृति,उपादान, काल और भाग्य के नामों से पुकारी जाने वाली आध्यात्मिक तुष्टियां अधिक भयंकर हैं,प्रकृति को आत्मा से भिन्न जान कर भी केवल प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों के नित्य नए दर्शन से अपने को संतुष्ट मान लेना,एक ऐसा झूठा भरोसा,जो अनेक साधकों को आत्मज्ञान की और बढ़ने से रोक देता है, उपादान तुष्टि के अंतर्गत वे रचनात्मक और सकारात्मक विषय हैं,जिससे संन्यास योग,धर्म,संगीत,कला,नैतिकता, सत्विकता,आदि विषयों की ओर पहल तो है,लेकिन उनकी तुष्टि भी इसी पहल तक सीमित है,येसे साधक अपनी सोच,वेशभूषा, जीवन शैली आदि की श्रेष्ठता के ही अंतिम लक्ष्य मानकर आत्म ज्ञान के पथ से हट कर रहते हैं,
सांसारिक भोंटिकता के प्रति जागरूक रहकर भी साधक काल नामक तुष्टि के कारण यह दृढ़ विश्वास अपने अंदर पाले होते हैं कि कल ही सब कार्यों का सामान हेतु है, और जब उनके जीवन में सुकाल आयोग ,उन्हे स्वत: ही आत्मज्ञान उपलब्ध हो जायेगा, येसे साधक इस तथ्य की उपेक्षा करते हैं, कि उन्नति के सदृश अवनीत का कारण भी काल है, और इस प्रकार आत्मज्ञान की ओर वे प्रवृत्त ही नहीं होते ,भाग्य नामक तुष्टि की अंतिम और निर्णायक मानने वाले साधक यह भूलजाते हैंकि उनका वर्तमान भाग्य उनके पूर्वकिए पुरषार्थ का ही परिणाम है,उनकी यह भूल उन्हे आत्मज्ञान के पथ से उपरत कर देती है,संतों का सत परामर्श हैं कि आजस्य और प्रमाद से रहित हो कर इन सभी तुष्टियों को धैर्य और शांति के साथ पहले समझो,फिर उन्ही की सीढ़ी बनाकर एटीएम ज्ञान रूपी परम पुरुषार्थ के पथ पर अग्रसर हो जाओ इस विधि से ये तुष्टियां उपरति नही बल्कि शक्तिरूप में हो जाती हैं,🙏(तुष्टियों को ही अपर गामी सीधी बनाएं)🙏
जय श्रीराम, जय श्रीराम, जय श्रीराम,
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे,