प्रेम बुड़ाकोटी
जाली ग्रांट / देहरादून

बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध,
देश पराधीन था,
परकीयों के आधीन था,
परतन्त्रता से मुक्ति को,
पूरा देश,
संघर्षरत था,आन्दोलनरत था ।
राष्ट्रीय ज्वार के गर्भ से,
नागपुर की धरती से,
जन्मजात देशभक्त,
युवा केशवराव हेडगेवार,
उसका अन्तर्मन, विवेक, व्यथा,अनुभूति,
वर्ष १९२५ में,इसकी परिणिति,
संघशक्ति का बीजाराण, उत्पत्ति ।
विजयादशमी,विजय का पर्व,
त्रेता का शौर्य,सनातन का गर्व,
असत्य की पराजय,
पुरुषोत्तम राम की विजय,
इस पुनीत वेला पर,
युवा केशव राव के प्रयास से,
कुशल,मेधावी विद्यार्थियों के मध्य,
राष्ट्रीय विचारों का उदय,
लघु स्वरूप में,
संघ कार्य का अभ्युदय ।
लक्ष्यपूर्ति का पथ दुर्गम था,
कण्टकमय,संघर्षपूर्ण था,
अवरोधों,बाधाओं से,
घिरा सम्पूर्ण था ।
अनेक प्रतिबन्ध लगे,कष्ट सहे,
पर इस अग्निपरीक्षाओ से,
संघकार्य निखरा ही, संवरा ही,
निरन्तर प्रयास से, नित्य अभ्यास से,
जो दिशा मिली,जो दृष्टि मिली,
वह संयम की थी,वह साधक की थी ।
पद,यश का मोह त्याग,
संस्कारों से युक्त, हो विरक्त,
युवा निकले सेवार्थ ,
साधक बन जीवन पर्यन्त,
समाज कार्य हेतु सर्वस्व समर्पण ।
प्रेरणा ?
‘राष्ट्राय स्वाहा,इदम न मम’
‘सब कुछ देश के लिये,
मेरा कुछ भी नहीं’ ।
सीमा सुरक्षा के मौके पर,
दुर्भिक्ष,महामारी,विपदाओं में,
राष्ट्रीय आपदाओं में,
प्रतिपल,प्रतिक्षण,जहाँ कम,वहाँ हम,
मन में सेवा का भाव लिये,
समाज के प्रति,
स्नेह- सागर अथाह लिये,
ग्राम,नगर,बस्ती,वन,पर्वत,
एक ध्येय,एक मन्त्र, एक स्वर,
श्रामिक,युवा,शिक्षक सन्यासी,
एक देश के पुत्र सभी हम,
युग-युग से सब भारतवासी ।
राष्ट्र-कार्य के लिये,
सम्पूर्ण समाज को साथ लिये,
सर्वस्पर्शी,सर्वव्यापी, सब ओर,
कार्य का मूल्यांकन,
आसेतु हिमालय आच्छादन,
सर्वत्र,
राष्ट्रभाव का जागरण,
देश भक्ति के सद् संस्कार,
अपसंस्कृति, षड्यन्त्रों का
सशक्त,संगठित प्रतिकार ।
गन्तव्य !
हिन्दू राष्ट्र का उत्कर्ष,
सुगठित भारत,संस्कारित भारत,
सम्पन्नता भी,सजगता भी,
देशहित केवल देशहित ।
विजयादशमी के पर्व पर,
संघ के स्थापना -दिवस पर,
राम के श्रेष्ठ आचरण का अनुसरण,
राम का संकल्प,अधिष्ठान,
उद्देश्य: परम वैभव,
और,
अजेय,अभय,अभेद्य, सदैव प्रगत ।
सशक्त,सुसंगठित,मंगलमय भारत ॥