जाली ग्रांट / देहरादून
प्रेम बड़ाकोटी

प्राचीनकाल की प्रचलित कथा;
सब प्रकार की शिक्षा पूर्ण कर,
गुरुकुल परिसर से,संस्कारित बटुक,
दीक्षान्त उपरान्त घर जाने को तत्पर ।
ऋषि ने गुरुमाता को संकेत किया,
और वह आश्रम के पूजागृह से,
थाली में हल्दी,चदन,नैवैद्य लिये,
साथ कुछ सूत्र रखकर,
पूजा के पात्र में धरकर,
विधान को थे सब प्रतीक्षारत।
गुरु शिष्य से बोले,-
मैं ढलती आयु का सन्यासी,
यह सूत्र तुमको बाँधता हूँ,
आखण्ड विश्वास के साथ,
गुरकुल की सुरक्षा का भार,
तुम्हारे सक्षम हाथों सौंपता हूँ।
जीवन मे जहाँ भी सेवारत रहो,
यहाँ के संस्कार,सदैव याद रखो ।
शिष्य ने भी गुरु के कर थामकर,
श्रद्धाभाव के साथ सूत्र बांधकर,
मन व्यक्त किया, गुरुवर,
आपने शिक्षा दी,संस्कार दिया,
सन्मार्ग दिखाया, उपकार किया ।
आप गुरुपद पर हैं,पथ प्रदर्शक हैं,
मेरे जीवन में यदि भटकाव आये,
आप निरन्तर हमें राह दिखायें ।
गौरवशाली इतिहास में,
वीराँगनाओं ने अपने ,
छत्राणी धर्म का पालन किया,
सेनिक पति को रक्षासूत्र बाँधकर,
धर्मार्थ रणक्षेत्र को विदा किया,
तथा आन, बान,शान के लिये,
स्वयं को भी होम कर दिया।
हाड़ा रानी,चूड़ावत की गाथा,
इसका ज्वलन्त प्रमाण है ।
श्रावण पूर्णिमा की प्रातःकाल,
उत्सुक रहता,पूरा परिवार,
कुलपुरोहित को प्रतीक्षा में,
अतिसामान्य,विद्वान वेदपाठी,
पुरोहित के हाथों रक्षासूत्र बन्धन,
मन्त्रोच्चारण के साथ,-
“येन बद्धो बलिराजा,
दानवेन्द्रो महाबला”।
रक्षाबन्धन के त्योहार पर,
आज भी गूँजते मन्त्र के वे स्वर,
यजमान के मणिबन्ध पर,
बाँघा गया धागा,कलावा
संकल्प,प्रतिबद्धता का प्रतीक है,
परिवार के सुमंगल की अर्चना है,
‘भद्राणि पश्यन्तु’ की कामना है ।
पर्व पर,बहिन की राखी,
वर्षों पुराना चलन है,
दायित्वबोध का सृजन है,
रक्षा,सुरक्षा का वचन है।
रक्षा बन्धन,अटूट बन्धन है,
यह सद्भाव का वचन है ।
रिश्तों का त्योहार है,
संस्कारों का यह पर्व है,
सांस्कृतिक गरिमा का गर्व है ॥
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