प्रकृति पर्व: मकर संक्रान्ति -प्रेम बड़ाकोटी

जोली ग्रांट / देहरादून

प्रेम बड़ाकोटी

मकरैणी !
संकराँन्त !
उत्तरायण !
आदिकालीन,सार्थक सम्बोधन,
माघ संन्कान्ति दिवस अति पावन,
ऊषाकाल से दिनचर्या पालन,
तन,मन की शुचिता,
पवित्र्य,स्नानध्यान,
आवश्यकताजनित को,
निःस्वार्थ,निष्काम दान,
पुण्य-लाभ, ईश्वरीय वरदान,
आप्लावित,
श्रद्धालु मन और दिव्यप्राण ।

इस पर्व के नायक,
भगवान भाष्कर,
प्रकृति के नियन्ता,उन्नायक,
उनका यह पदार्पण,
निकटस्थ मकर राशि पर,
माघ संक्रान्ति का दिन,
ब्रह्माण्ड में नवोन्मेष,
उतरायणी का पावन अवसर,
परिवर्तन का शुभ सन्देश ।

मकर संक्रान्ति !
क्रान्ति अर्थात् सुक्रान्ति,
उथल पुथल नहीं,
जीवन में,कार्यों में तीव्रता,तेजस्विता ।
‘ओ३म् द्यौ शान्ति’ के मन्त्रानुसार,,
सकारात्मक,मर्यादित क्रान्ति,
धरा से नभ तक,
सहज,सम्यक् सदक्रान्ति ।
प्रकृति का यही नियम,
सतत्, संयमित ।

भरतभूमि का वैशिष्ट्य
ऋतु वैविध्य,
षड्ऋतुओं का शाश्वत् क्रम,
शीतकाल, शिशिर,
पर,
मकरैणी के इस क्षण से,
मन्द होती शीत की ठिठुरन,
सुखद अनुभूति,
वातावरण में किञ्चित परिवर्तन ।

तात्पर्य ?
उत्थान,प्रगति,विकास,
केवल भौतिक नहीं,
सात्विक और आध्यात्मिक भी,
परिवर्तन ही जीवन है
प्रकृति का प्रबोधन है,
सूर्य का उत्तर की ओर विस्तार,
ब्रह्माण्ड में तेज का संचार,
उत्तरायण का अर्थ ?
ऊर्जा का ऊर्ध्व संचरण,
उतरायण का अर्थ,
जड़ता,अवरोधों का होता क्षरण ।

मकर संक्रान्ति !
सूर्वदेव का उत्तर-गमन,
चिरप्रतीक्षित शुभकार्यों का श्रीगणेश,नियमन,
यह वह साँस्कृतिक पर्व है,
जिसका आसेतु हिमालय,
हर राज्प में, ओर छोर,
सभी ओर,
पोंगल,बिहू,खिचड़ी,उत्तरायण,
घुघुतिया,संकराँत आदि,आदि,
त्योहार के विविध नाम ।
किन्तु,
इस विविधता मे,
समरसता विद्यमान है,
वही भारत की पहिचान है ।
सूर्य नारायण !
सृष्टि के उन्नायक हैं,
जीवनचर्या के नायक हैं।
यह महापर्व !
उनकी माहिमा,
उनकी गरिमा का परिचायक है ।

यह त्योहार,
तिलगुड़,खिचड़ी,उष्ण खाद्यान्न,आहार,
या फिर,
‘काइट फ्लाइंग’ मात्र का नहीं,
मकर संक्रान्ति !
यह ‘समाज उत्सव’ है,
सौर प्रदत्त,धार्मिक उत्सव है,
प्रकृति का साक्षात् वैभव है ।
अपनी धरा पर,
उत्सव !
केवल परम्परा,औपचारिकता नहीं,
समाज की आस्था है ,
व्यवहार है,कृतनिश्चय है।

मराठी का यह सन्देश !
प्रेरक है, पर्व का घोतक र्है,
‘मकर संकान्तीच्या,हार्दिक शुभेच्छा’,
‘तिळगुळ घ्या, आणि गोड बोला’।
‘मधुर आहार, मधुर व्यवहार,’
इस पुनीत पर्व पर,
यही संकल्प !
श्रेष्ठ आचरण,जनजन में अपनापन,
समाज,देश और निज जीवन,
स्वस्थ,शुचितापूर्ण हों प्रतिदिन ॥