मां की जीवन यात्रा किसने किया था ईच्छा मृत्यु को जागृत

देहरादून  -पर्यावरणविद् विनोद जुगलान जी की कलम से

मां की जीवन यात्रा
किसने किया था ईच्छा मृत्यु को जागृत?
आज के आधुनिक युग जब हम ज्ञान, विज्ञान की पराकाष्ठा पर बात करते हैं। और उनके साथ जिए गए पलोंआज के इस अत्याधुनिक समय में भी ईच्छा मृत्यु के वरदान को जागृत किया जा सकता है? क्या हमारे बुजुर्ग इस विधा को परम्परागत रूप से जानते हैं?इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आपको अपने बुजुर्गों के साथ साथ उनकी जीवन यात्रा से जुड़े अनुभवों की याद अवश्य आएगी।हो सकता है आपके साथ भी ऐसी घटनाएं बेशक हुई हों या न हुई हों लेकिन आपने ऐसी बातें सुनी अवश्य होंगीं।
क्या उन्होंने ईच्छा मृत्यु के वरदान को प्राप्त कर लिया था?
हां ऐसा ही कुछ हुआ था उस रात को जो आपको हमें इस ओर सोचने पर मजबूर कर देता है। किसने जागृत किया था अपनी ईच्छा मृत्यु को।
उनका जन्म ग्राम खंडोली पौड़ीखाल देवप्रयाग विकासखंड में पट्टी खास के मशहूर झाड़कंडी स्वर्गीय कमला नन्द रतूड़ी जी के घर में कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी 15 नवम्बर 1938 भौम वार को हुआ।
बाल्यावस्था 14 वर्ष की उम्र में विवाह ग्राम करास चंद्रबदनी टिहरी गढ़वाल में स्वर्गीय सोबतराम उपाध्याय जी के साथ हुआ।विवाह सूत्र में बंधने के बाद बिना सास ससुर के घर में आई न कोई बड़ा बस एक लगभग हम उम्र देवर थे। खाली बंजर खेतों को जीवित करने में सक्रियता निभाई।
गांव में अपनी अलग पहचान बनाई।
अपने देवर के साथ अपनी छोटी बहन की शादी इस उद्देश्य से करवाई कि
जिससे परिवार में मेल मिलाप बना रहे।
आज भी करास में उनकी जीवटता की कहानी बड़े बुजुर्गों से सुनने को मिलती है।
ग्राम पंचायत का प्रतिनिधित्व किया। चार पीढ़ियों का साथ लगभग 40 साल तक रहा।उनका नाम था झांपी देवी।
परिवार और समाज के प्रतिसंवेदनशीलता उनमें बाल्यकाल से ही समाहित होने लगी थी।इस बात का उदाहरण उनके जीवन काल में घटित उस
घटनाओं से मिलता है जो सामान्य नहीं थी। हां वास्तव में उन दिनों लोग पढ़े लिखे कम बेशक होते थे लेकिन संस्कारों का पालन समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी बच्चों को बचपन में ही सिखा दी जाती थी। उम्र में पच्चीस के पायदान पर कदम रखने से पूर्व ही उन्होंने करास के जंगल (जो मां भगवती चंद्रबदनी मंदिर का क्षेत्र है)तत्कालीन चिपको आंदोलन की शुरुआती दौर में ही आंदोलन में सक्रिय भूमिका में आ गईं। यह दौर था 1962 से 1977 का।इस आंदोलन में उन सहित करास की उन सैकड़ों बहु बेटियों की भूमिका रही जो पैबंध बांधकर अपने हक हकूक के लिए प्रथम पंक्ति में रहीं लेकिन हमारे राज्य की परिणीति कहें या हमारा दुर्भाग्य की हमारे महत्वपूर्ण इतिहास सहित हमारी वैदिक विधाओं के परम्परागत ज्ञान को लिखने में जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था वह नहीं लिखा जा सका।तो फिर उन विभूतियों और विधाओं को हम भूलते चले गए।खैर… आते हैं उस मूल बात पर की जिनका यहां जिक्र किया जाना जरूरी ही नहीं महत्वपूर्ण भी है। उन्होंने राज्य आन्दोलन में ग्राम सभा खदरी खड़क माफ की महिलाओं के साथ सक्रिय भूमिका निभाई।
मुझे स्मरण है कि
हमारे बचपन में प्रदत्त संस्कारों में सम्मान देना ही प्रथम पाठशाला का पहला सूत्र है।यह बात हमारी माताजी ने अपने से बड़े स्वजाति के ही नहीं अपने क्षेत्र के ठाकुर, ब्राह्मण और औजी समुदाय के बुजुर्गों को भी सामान रूप से नाना , मामा का रिश्ता देकर सेवा- सौंली रामा कृष्णी करने का संस्कार दिया था।
ऐसा ही सम्मान हमारे बुर्जुगों को भी संस्कार प्रद ज्ञान के कारण समाज में मिलता है।
विप्रवंश और इससे भी बड़ी बात कि पूर्व सैनिक और पुराने परिवारों में गिने जाने वाले लोगों में पिताजी को भी यही सम्मान प्राप्त था।वे पिताजी को भाई जी कहकर संबोधित करतीं। हमें एक पूफू (बुआ)और मिल गईं थी। मेरा उनसे मिलना उस समय हुआ जब हम स्वयं किशोर थे। बुआ जी को नाम से कम और उनके तीव्र विचारों से अधिक जाना जाता था। अधिकांश लोग उनसे तब परिचित हुए जब लगभग 1986 से नब्बे के दशक में उन्हें महिला मंगल दल अध्यक्ष और पंचायत सदस्य के रूप में उनके विचारों को ऊर्जा मिली।
उनकी स्पष्टवादिता कुछ लोगों का हाजमा खराब कर देती थी।वे निर्भीक होकर बोलती। उनके समय में आज जैसी राजनीति नहीं थी। मुझे उन्हें वोट देने का सौभाग्य मिला था।
आओ उस पहलू को छूते हैं जिसको लेकर लेखन के लिए लेखनी नहीं अंगूठा सक्रिय है।
वे कहती….बाबा भगवान से डरियूं चहेंदु! क्वी भी काम कन्न त भगवान् से डरी क।भगवान की याद सबसे पैली कन्न!
वे एकादशी का व्रत रखतीं थी।बीते कुछ माह पूर्व सड़क दुर्घटना में उन्हें बिस्तर पकड़ना पड़ा। बहु बेटों और नाती पोतों को सेवा का अवसर मिला तो पहरेदार की तरह खड़े होकर सेवा सम्मान मिला। सुविधानुसार मँझले बेटे के घर को चिकित्सालय के कक्ष की तरह परिवर्तित कर दिया गया।
महीनों तक से चली आ रही सेवा का परिणाम आने वाला था।वे हर दो चार दिन बाद पूछती ऐला महावीरा!एकादशी कब होली ?
कभी रोशन कभी संजू तो कभी पप्पू को कभी बहुओं को कभी पोते को कहती तेरी मां क्या कन्नी?
खबर करने वाले की चिन्ता करती कि उनके चाय पानी तैयार हो रही कि नहीं? अपने लिए सिर्फ एकादशी…वह कष्ट में भी कभी दुःखी नहीं दिखीं। क्या कन्न बाबा भोगण होलू जथा वू ता भोगण पल्लू ! खूब कमाई खूब हाड़गा तोड़ींन खूब खाई भीया हमून। यख त हम बाद मा आयो। ये से पहली हरिद्वार ऐगी था हम ! ऐसा हम उनसे सुना करते थे।
उस सुबह ही अनायास उनकी याद आई तो महावीर उपाध्याय भाई को उसी क्षण फोन लगाकर उनकी कुशलता ली। पता चला आज उनके चिकित्सकीय परामर्श और फाइनल परीक्षण और के लिए अस्पताल लेजाया जा रहा है।उसी क्षण उन्हें कार में बैठाकर उन्होंने मुझसे बात की। शाम को सकुशल घर लौट आए।परिजनों के कठिन परिश्रम और सेवा सम्प्रति से उनका कूल्हा जुड़ गया था। अगले दिन उन्हें वाकर की मदद से चलना था।उनके चलने की तैयारी थी। डॉ ने उन्हें वाकर से चलने के लिए कहा था।घर आते ही संध्या के समय प्रभु स्मरण के साथ ही उन्होंने चलने के लिए लाठी मांगी तो बेटों कहा कल शुरू होगा ।किसी को नहीं मालूम था कि एकादशी की प्रतीक्षा समाप्त होने जारही है।वे अपने जाने से पहले ही लाठी की मदद से सबको चलकर दिखाना चाहती थी कि उनके बेटे बहुओं और पोते पोतियों की सेवा का परिणाम सफल रहा। वे उन्हें प्रमाण देकर सम्मानित करना चाहती थी।जिसको हम पढ़े लिखे लोग समझ न सके और कल की बात कहकर वॉकर से चलने को कहकर रोटी पानी खाकर सब सो गए थे।किसी को आभास नहीं था कि उन्होंने अपने हिस्से के स्वास और गास दोनों पूरे कर लिए थे।उनकी एकादशी के व्रत का उद्यापन मोक्ष एकादशी पर सब लोगों को बिना आमंत्रण के ही गंगा तट पर उनकी सांसारिक यात्रा के समापन के साथ लिखा था या उन्होंने ईच्छा मृत्यु को पा लिया था?यह सोचने को मजबूर मन ने अंगूठे को लिखने के लिए निर्देशित किया। कि क्या विज्ञान के इस युग में भी ईच्छा मृत्यु को जागृत किया जा सकता है ?
उनकी अंतिम ईच्छा थी कि चलने से पूर्व परिजनों को चलकर दिखाया जाए। मोक्ष एकादशी 1 दिसंबर 2025 सुबह वह अनंत की यात्रा पर निकल गईं। परिवार में चार पीढ़ियों तक का सफर 40 वर्षों तक रहा।करास के जंगलों से पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाने वाली गोलोक वासी पूज्य पूफू (बुआ जी) स्व झांपी देवी उपाध्याय की पुण्य आत्मा को कोटिश नमन विनम्र श्रद्धांजलि। जय हिमालय जय हिन्द।