देहरादून:
आशा कोठारी

वन्देमातरम्!
सार्धशती के शुभ अवसर पर,
१५० वीं पूर्ति, विषय पर,
जन्मदिवस के पुण्य क्षणों में,
स्वागत है, वन्दन है,
जागरण-गीत!
तुम्हारा अभिनन्दन है।
वन्देमातरम्!
यह बंकिम बाबू की,
रचना मात्र नहीं,
‘आनन्दमठ’ का प्रेरक अध्याय है,
यह पृष्ठ है अतीत के गौरव का,
राष्ट्र के स्वर्णिम वैभव का।
स्वाधीनता के संघर्ष का,
भारत के उत्कर्ष का।
यह केवल एक गीत नहीं,
यह वन्दन है पावन माटी का,
सन्दर्भ है अपनी परिपाटी का।
यह जननी का अमरगान है,
स्वत्व की पहिचान है।
यह मन्त्र है उस चेतना का,
जो क्रांतिवीरों के अंतर्मन में,
हुंकार बन कर गूंजता था,
प्रत्येक देशवासी अर्चक बन,
इसे पूजता था।
सुनो,
मेरे इतिहास के अतीत!
तुम साक्षी हो उस त्याग और तप के,
उस सतत् संघर्ष के,
जो कहता है,
गुलामी नहीं, संघर्ष का काल था,
शहीदी आन, बान, शान,
असंख्य अमर बलिदान,
जो निरंतर हैं, अविराम हैं,
अदृश्य शिलापट, पर जिनके नाम हैं।
किन्तु!
आज माँ का कौन ऐसा लाल है?
जो मातृवन्दना के विरोध में खड़ा है,
किसकी आँखों पर,
स्वार्थ का आवरण जड़ा है,
कौन है?
जो अपनी विरासत को पहिचानता नहीं,
परम्परा, संस्कृति को जानता नहीं,
हम केवल भारतवासी ही नहीं,
भारत माँ के पुत्र हैं,
देश के लिये जियें,
यही संकल्प मात्र है।
इसीलिए,
मुक्त कंठ से कहें, – ‘वन्देमातरम्’,
यह भारत माँ की आराधना है,
पीढ़ियों की साधना है।
वन्देमातरम्,
राष्ट्रचेतना का मन्त्र है,
इसी से भारत स्वतन्त्र है,
बस,
यही मन्त्र है, मन्त्र है, मन्त्र है॥