प्रातःस्मरणीय श्री स्नेहपाल जी । – विनम्र सुमनाञ्जलि

प्रेम बड़ाकोटी

जोली ग्रांट / देहरादून

प्रातःस्मरणीय श्री स्नेहपाल जी । – विनम्र सुमनाञ्जलि :*

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, मेरे विद्यार्थी काल से ही चिरपरिचित श्री स्नेहपाल सिंह जी का शरीर पूरा होने पर कष्ट है। वे पुरानी पीढ़ी के कार्यकर्ता तथा संघ की गहराई से समझ रखने वाले निष्ठावान स्वयंसेवक थे। नितान्त अभावों के काल में जिन संघ प्रचारकों ने कठिन स्थानों पर कार्य को स्थायी किया उस श्रृंखला में उनका नाम उल्लेखनीय है। मेरे संघ जीवन से उनकी प्रेरणा जुड़ी है,जो स्वाभाविक आज मानस पटल पर उभर आई ।

वर्ष 1972 मई मास, मैं मेरठ से कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षा,के तुरन्त पश्चात और संघ शिक्षा वर्ग पीलीभीत से पूर्व एक माह के लिये शाखा विस्तार के निमित्त मुझे जनपद के प्रमुख एक स्थान परीक्षतगढ़ भेजा गया। मेरे जिला प्रचारक श्री दिनेश चन्द्र त्यागी वहाँ स्कूटर पर छोड़कर आये। यह मेरठ जनपद एक ऐतिहासिक गाँव था। उन्होंने मुझे ग्रामवासी श्री हरिदत्त त्यागी, श्री बालकराम जी सरीफ तथा श्री लल्लू राम जी तेल वालों के सुपुर्द किया और लौट आये । किला परीक्षतगढ़ मवाना तहसील में था। श्री स्नेहपाल जी तहसील केप्रचारक थे । वे एक सप्ताह बाद इधर प्रवास पर आये। मेरा उनसे वह पहिला परिचय था । वे शरीर से दुबले तथा तेजस्वी तरुण प्रचारक थे,और मैं आयु में छोटा किशोर स्वयंसेवक। उनदिनों विद्यार्थी कार्यकर्ता परिवारों में रुकते थ,वहाँ परिवार के सदस्य की तरह उनकी चिन्त होती थी तथा उन्हें अपनापन भी अनुभव होता था। श्री स्नेहपाल जी का परिवारों में आत्मीयतापूर्ण सम्बन्ध था। उन्होंने श्री बालक राम जी के परिवार में मेरी व्यवस्था की । मुझे स्मरण है,बालक राम जी की माँजी ने हल्की डाँट लगते हुए अपने बेटे से कहा, पराये बच्चे को गाँव मे लेकर आये हो तो ध्यान भी रखो । कालान्तर में किसी कार्यकर्ता ने बताया कि गत वर्ष मेरठ से श्री अजय मित्तल विस्तारक होकर आये थे, निकट के पूठी गाँव की संघ शाखा उन्हीं के प्रयास से प्रारम्भ हुई ।
* एक मास के विस्तार के उपरान्त प्रथम वर्ष,संघ शिक्षा वर्ग श्री स्नेहपाल जी के संरक्षण में ही गया। संघ की कुछ और समझ आने के बाद जानकारी हुई कि माँ के पुत्र श्री ओमपाल जी व स्नेहपाल जी दोनों प्रचारक हैं,समाज कार्य के लिये समर्पित हैं। ओमपाल जी आयु में बड़े हैं,दोनो मेधावी हैं, प्रखर हैं, अध्ययनशील है तथा अच्छे वक्ता हैं। दोनो प्रचारक के रूप में लम्बे समय कुमाऊँ के संघ कार्य में सन्नद्ध रहे । दोनों 1975 के आपात्काल में कारागार में रहे, वे लोकतंन्त्र सेनानी हैं।

प्रसंगवश श्री ओमपाल जी के सन्दर्भ की अतीतकालीन स्मृति ताजा हो गई । दिवंगत आत्मा की सुमनाञ्जलि स्वरूप कुछ भाव अनायास उभर आये,मित्र ऋण के किञ्चित उद्गार, दिवंगत आत्मा के सम्मुख निवेदित, भावुक मन से मात्र इतना ही,अस्तु ।